Monday, March 19, 2012

कासी के अमीरों से कबीरों का पता पूछा

"कासी के अमीरों से कबीरों का पता पूछा
ध्रुव तारा और लहर तारा के बीच
शंकर के शहर में सड़क क्यों हांफती है ?

और सोया है संस्कारों के गुबारों में शहर यों क्यों ?
सवालों के उत्तर क्यों सर झुकाए खामोश से हैं

घर से मगहर क्यों चला आया कबीर ?
"---- राजीव चतुर्वेदी

Sunday, March 11, 2012

कवि निरपेक्ष होते हैं सापेक्ष नहीं

"एक बात बताऊँ तुम्हें,
कवि निरपेक्ष होते हैं सापेक्ष नहीं
बिलकुल वैसे ही जैसे किसी नवजात के पैदा होने पर सबसे ज्यादा शोर करते हैं हिजड़े
कवि सदैव तटस्थ भाव के प्रेमी होते हैं
कवियों में प्रायः होता है साक्षीभाव
यह भी समझ लो कि--
जिसमें होतां है साक्षीभाव उसमें होता है संघर्ष मैं शामिल होने के साहस का अभाव
कवि वातानुकूलित कमरे की बंद खिड़की से देखता है वख्त की लोमहर्षक आंधी
कवि वातानुकूलित कमरे की बंद खिड़की से देखता है ओस की बूँदें, गिरती वर्फ
कवि वातानुकूलित कमरे की बंद खिड़की से देखता है धूप मैं तपते खेत खलिहान और किसान
कवि अपने माता पिता का पूरे जीवन तिरष्कार करके करते हैं कागज़ पर कविता में उनकी वेदना का अविष्कार
कवि मुफ्त की दारू पीकर फुफकारता है क्रान्ति
कवि बंद कमरों मैं खुली बहस करता है
कवि के किरदार होते हैं सिंथेटिक और नज़र होती है प्रेग्मैटिक
कविता अगर शिल्प है तो षड्यंत्र का सुन्दर स्वरुप है जो सच में कुरूप है
कविता अगर संवेदना है तो संघर्ष का शेषफल बताओ विभाज्य इकाई की वेदना भी सुनाओ
कविता अगर जागते समाज को सुलाती हुई लोरी है तो वह वैश्या के कोठे पर रखी पान की गिलौरी है
कवि दूसरे को खर्च कर अपनी कविता का कच्चा माल बनाता है तब एक कविता गुनगुनाता है
अगर सापेक्ष हो तो संघर्ष मैं शामिल हो जाओ और निरपेक्ष हो तो कविता सुनाओ
जब सीधी सपाट बातें भी लोगों की समझ मैं न आ रही हों तो कविता की जरूरत है भी क्या ?
बहुत सुन लीं जनवादी कविता से अवसरवादी व्यख्या
अगर समझो तो समझ लो यह भी कविता एक निर्विवाद संवाद भी है
समाज के बीच खींची दीवार का कान भी है
कविता पत्थरों की धड़कन है
कविता तारे का एकाकीपन भी है
कविता जंगल में रोने का संवाद है
कविता एक गुनगुनाया जानेवाला अवसाद है
कविता क्रान्ति की जड़ों की खाद है
अगर हो सके तो लड़ाई मैं शामिल हो जाओ और जब युद्ध मैं घायल हो तब ही कविता गुनगुनाओ." -----राजीव चतुर्वेदी


त्रिज्या अब सयानी हो गयी है

"त्रिज्या अब सयानी हो गयी है
परिधि का पहरा बहुत गहरा है उस पर 
केन्द्र की भी कशमकश तुम जान लो
क्षितिज के छल से सिमटा है अपनी ही निगाहों में
ज्योमिती की हकीकत जिन्दगी की भी जरूरत है
दृष्टिकोणों की नहीं तुम दर्शनों की भी पड़ताल करलो
शून्य से चल कर हमारे आचरण अब एक सौ अस्सी अंश तक  अंगडाईया ले रहे है
प्यार के रिश्ते नहीं अब देह के रस्ते कहो तुम और यह भी जान लो
आत्मा से नहीं अब देह से स्पर्श रेखा जो खींची है
परिचय की परिधि का प्रश्न है वह
और तुम हो केन्द्र में
क्षितिज के छल को मरीचिका मान बैठे हो
परिधियों की अवधियों की पैमाइश परिक्रमा से जो करते हैं वो कायर हैं
पराक्रमी तो केन्द्र पर अधिकार करते हैं
प्रयोगों की प्रमेयों तक छल एक निश्च्छल सा, अज्ञान को विज्ञान किसने कहा ?
यक्ष हों या मोक्ष सभी ने कोशिशें की है कि सच को जान जाते वह
परिधियाँ नापनेवाले परीक्षा दे के लौटे है
तीर्थ के अर्थों के जैसी त्रिज्या केन्द्र के संपर्क में है
और तुम सत्य की दे कर परिक्रमा खाली हाथ लौट आये."  ----- राजीव चतुर्वेदी

मैं एक लडकी थी, करती भी क्या ?


"मैं एक लडकी थी
करती भी क्या ?
गुड़िया के बर्तन मांजे थे फिर
घर के बर्तन भी माँजे
करती भी क्या ?
शोषण -पोषण के शब्द खदकते थे मन में
मैंने भी सब्जी के साथ उबाले हैं कितने
वह प्यार खनकते शब्दों सा खो गया कहीं खामोशी से, फिर मिला नहीं
"ममता-समता" की बात शब्दकोषों तक से पूछी बार-बार
विश्वास नहीं होता था रिश्तों का सच कुछ सहमा, कुछ आशंकित सा
शब्दकोषों से कोसों दूर खड़ा है क्यों ?
मैं एक लडकी थी
करती भी क्या ?
काबलियत और कातिल निगाहों की निगहबानी में
रास्ते तो थे भीड़ भरे पर उसमें मेरी राह बियावान थी
गिद्धों की निगाहें और
उससे छलकती शिकार के प्रति शुभकामना भी मेरे साथ थी
सहानुभूति का चुगा जब कभी खाया तो
बार बार लगातार उसका कर्ज भी चुकाया
और जब नहीं खाया तो खिसियाया शिकारी सा हर रिश्ता नज़र आया
मुझे सच में नहीं पता कि मैं किसी प्रेम का उत्पाद थी
या प्रेम के हमशक्ल प्रयाश्चित का प्रतिफल पर
मैं एक लडकी थी
करती भी क्या ?
चरित्र के वह फ्रेम जिसमें
मुझे पैदा करने वालों की तश्वीर छोटी पड़ती थी
मुझे फिट होना था
किसी को क्या पता कि मेरे मन में भी एक अपना निजी सा कोना था
सपने थे
शेष बचे कुछ सालों का समन्दर जो उछलना तो चाहता था पर था ठहरा हुआ
कुछ गुडिया थी ओझल सी
कुछ यादें थी बोझल सी
कुछ चिड़िया अभी चहकती थीं
कुछ कलियाँ अभी महकती थीं
कुछ गलियाँ अभी बुलाती हैं मुझको यादों की बस्ती में
कुछ शब्द सुनायी देते हैं जो फब्ती थे
कुछ गीत सुनायी देते हैं जो सुनती थी तो अच्छा सा लगता था
वर्तमान में जीने की जब चाह करी तो अपनों ने कुछ सपनो से गुमराह किया
कुछ सपने ऐसे भी थे जो गीत सुनाया करते थे फिर ग़ुमनाम हुए
कुछ सात्विक से जो रिश्ते थे पर हम उनमें बदनाम हुए
बचपन में गुडिया के कपड़ों पर पैबंद लगाया करती थी
यौवन मैं अपनी बातों में पैबंद लगाया करती थी
कुछ बड़ी हुई तो संवादों में पैबंद लगाना सीख लिया
वह रिश्ते जो थे आसों के
वह रिश्ते थे विश्वासों के
वह रिश्ते नए लिबासों के
जब थकते हैं तो पैबंद लगाना पड़ता है
मैं सुन्दर सा एक कपड़ा हूँ -- कुछ बुना हुआ,कुछ काढा हुआ,
कुछ उधड़ा सा, कुछ खोया हुआ ख्यालों में
तुम अपनी फटी दरारों में
तुम अपने उलझे तारों में
तुम अपने बिखरे चरित्रों पर
तुम अपने निखरे चित्रों पर
जब भी चाहो चिपका लेना
मैं पाबंदों का दुखड़ा हूँ
मैं पैबन्दों का टुकडा हूँ
मैं एक लडकी थी
करती भी क्या ?" ----- अनामिका मिश्रा

Friday, March 9, 2012

सपने तो तैरे थे मेरी आँखों में

"सपने तो तैरे थे मेरी आँखों में
कितने ? ---अंदाज़ नहीं,
मेरा हर सपना
घूँघट से चल कर चौखट तक आया
फिर बिखर गया
सपने सच हो जाएँगे इक रोज
इन्ही संघर्षों में
जीवट से जूझा मैं मरघट पर आया
फिर किधर गया
सपनो का हश्र यहाँ होता है यह
कुछ इधर गया, कुछ उधर गया, कुछ बिखर गया
आने वाली पीढी की आँखों में
हर सपना जो था सहमा सा वह ठिहर गया."  -----राजीव चतुर्वेदी     



शब्दों का सन्नाटा तोड़ो --कुछ तो बोलो

"शब्दों का सन्नाटा तोड़ो --कुछ तो बोलो
मैं भी चुप हूँ
तुम भी चुप हो
इत्र फुलेलों और गुलाल से गलियाँ महक रही हैं
और पेड़ की हर डाली पर चिड़ियाँ चहक रही हैं
शब्दों का सन्नाटा तोड़ो --कुछ तो बोलो
तुम्हारी खामोशी ख़तरा लगती है
बोलो मेरी जान !!---तुम्हारे शब्दों में सामर्थ्य बहुत है
खून सर्द जब होता है तो शब्दों से सुलगाता हूँ मैं
आशंकाओं से आहात हो शब्दों को दोहराता हूँ मैं
शब्दों में संगीत पिरोओ कुछ तो बोलो 
मैं भी चुप हूँ
तुम भी चुप हो
कुछ तो बोलो
बोलो मेरी जान !!---तुम्हारे शब्दों में सामर्थ्य बहुत है."  ----राजीव चतुर्वेदी 

Wednesday, March 7, 2012

जिन्दगी के इस सफ़र को रंग रोचक तो बनाता है

"जिन्दगी के इस सफ़र को रंग रोचक तो बनाता है
साधकों की साधना का केन्द्र
बच्चों की किलकारी और पिचकारी पूछो
प्यार की बस्ती का रास्ता
होलिका की आग से रोशन हो रंग और राग तक जाता है." ---- राजीव चतुर्वेदी
" साजिशें लगाती जिस शहर में हों गुलाल ,.
उस शहर का नागरिक होने का मलाल है.
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उनके दिल काले और हाथों में गुलाल है,
यह हादसा देख कर मुझको मलाल है.
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ये बाज़ार के रंग तो दो दिन का तमासा हैं,
मेरे दिल पर रंग अपना चढाओ तो कोई बात बने.
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दिल है बदरंग, दिमाग है तंग पर हाथ मै है रंग,
इन रंगरेजों के रिश्ते रूहानी नहीं जिस्मानी हैं .
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सुबह रंग डालो शाम को गले मिलो,
पीठ में छुरा कल भोंक लेना .
अगर इससे खुश हो तो बधाई तुम्हें,
वरना पश्चाताप के आंसू पोंछ लेना. " 
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"मैं भी रंगा हुआ हूँ ज़माने के रंग में,
ऐ आईने तू ही बता मेरी असलीयत क्या है ?" 
----- राजीव चतुर्वेदी
 
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"आओ मेरे यारो
रंग लगा लो
गले लगा लो
भंग जमा लो
गालों पर भी मलो गुलाल
गाली तुम बकते हो तो ऐसा लगता है
मेरा कुत्ता भौक रहा है
यों तो कौओं को भी कुदरत ने हक़ बक्शा है कुछ कहने का
जब भी बोलो इन पर्वों पर
ऐसा बोलो
चिड़िया जैसे कुहुक रही हो
और हमारी हर हरकत को
आने बाली नश्लें देख रही हैं दालानों से
हमारी तरुणाई फूलों की अंगड़ाई जैसी
और हमारा प्यार सुगंधों सा फैला है
बहने, भाभी, प्रिया हमारी प्रेम परिधि में सब आती हैं
नन्हे बेटे, छोटा भाई प्यार हमारा सब पाते हैं
प्यार हमारा फूलों जैसा इस फागुन में भी महक रहा है
और स्नेह बहनों के मुह से चिड़िया जैसा चहक रहा है
प्रह्लादों की औलादों तुम यह बतलाओ
उस होली से इस होली तक
अच्छे लोग हाशिये पर क्यों कातर से खड़े हुए हैं ?"-----राजीव चतुर्वेदी

Friday, March 2, 2012

ख्वाब अब कोई नहीं शेष बचा इन आँखों में

"कल वो खुद ही गिरा था
आज गिरा है आंसू बन कर
ख्वाब अब कोई नहीं शेष बचा इन आँखों में."
  ----राजीव चतुर्वेदी  

Thursday, March 1, 2012

कलाम -ऐ- पाक की कसमें, आयत और रवायत भी

 " कलाम -ऐ- पाक की कसमें, आयत और रवायत भी
तुम्हारी शातिराना चुप्पी और मजहब की हिमायत भी
सभी ज़िंदा थीं कल काशी के किनारों पर
उसी काशी की बेटी को तुमने मार डाला है
खून के कतरे और बिखरे चीथड़े
आरती के प्रार्थी और अर्थियों के बीच
तंग जहनी और तंग गलियों के पेचीदा सफ़र में
जो गुजरती है वह मुहब्बत की शहादत के सिवा कुछ भी नहीं.

ये सच की सीढियां जो घाटों को जाती हैं
ये सहमी पीढियां जो सच को गुन गुनाती हैं
ये खूनी सीढियां जो सुनती थीं विस्मिल्लाह की शहनाई
यही बैठा था कबीरा और कविता थी गुनगुनायी
उसी काशी की बेटी को तुमने मार डाला है.

खून के कतरे और बिखरे चीथड़े
आरती के प्रार्थी और अर्थियों के बीच
तंग जहनी और तंग गलियों के पेचीदा सफ़र में
जो गुजरती है वह मुहब्बत की शहादत के सिवा कुछ भी नहीं. " -- राजीव चतुर्वेदी
(गुजरे साल २०१० में कासी में गंगा के घात पर आतंकवादीयों ने बम के धमाके को अन्जाम दिया था जिसमें एक अबोध बालिका भी मारी गयी थी इस पर मैंने उसी दिन यह कविता लिखी थी)
 

लेकिन समझ लो ऐ जयद्रथ वख्त का सूरज अभी डूबा नहीं है


"समंदर की सतह पर एक चिड़िया ढूंढती है प्यास को
अब तो जन - गण - मन  के देखो टूटते विश्वास को
वर्फ से कह दो जलते जंगलों की तबाही की गवाही तुम को देनी है
और कह दो साजिशों से सत्य का चन्दन रगड़ कर अपने माथे पर लगा लें
और जितना छल सको तुम छल भी लो
लेकिन समझ लो ऐ जयद्रथ वख्त का सूरज अभी डूबा नहीं है
एक भी आंसू हमारा आज तक सूखा नहीं है. " --- राजीव चतुर्वेदी