Wednesday, March 28, 2012
जिन्दगी बहती है बहती हैं नदियाँ जैसे
"जिन्दगी बहती है बहती हैं नदियाँ जैसे
गुजरे रास्तों पर लौट कर आती ही नहीं
पत्थरदिलों के बीच नदियों सा बहा मैं,
कुछ पत्थरों ने चीर डाला था मुझे
कुछ को रगड़ कर रेत मैंने कर दिया
कुछ बह गये बहाव में
कुछ थे खड़े तटस्थ साक्षीभाव में
कुछ घाट से स्थिर खड़े ही रह गए
याद है वह नाव मुझमें तैर कर अपने किनारे खोज फिर क्यों खो गयी
जिन्दगी बहती है बहती हैं नदियाँ जैसे
गुजरे रास्तों पर लौट कर आती ही नहीं." ---- राजीव चतुर्वेदी
Monday, March 26, 2012
मैंने वह बोला जो खुरचा था ह्रदय के पंकिल तलों से
" मैंने वह बोला जो खुरचा था ह्रदय के पंकिल तलों से
तुम ये बोले सच तो था पर संजीदा नहीं था
मैने पूछा वह भी कभी इतना तो पाकीज़ा नहीं था
मैंने भेजे शब्द सच के सैनिकों से रक्त रंजित
तुम ये बोले शब्द तो थे पर उनका उचित श्रिंगार नहीं था
मैं तो बोला था तरुणाई के माने युद्धों की अंगड़ाई है
मैं करुणा की पैमाइश करके क्रान्ति लिखा करता था
तुम कविता में कामुकता का रस घोल रहे थे
शब्दों का सौन्दर्य समझते तुम भी थे
शब्दों से मैं शौर्य उकेरा करता था
प्यार की प्यारी परिधियों की परिक्रमा कर तुम कहाँ पहुंचे ?
मैं केंद्र में था हर पराक्रम के
शब्द मेरे युद्धरत थे जिन्दगी की शाम को घायल से आते
उस समय तुम प्यार की पेंगें बढाने जा रहे थे
तुमने चाहा दुल्हनो से शब्द ही स्वीकार करलूं
मैं ये बोला जनपथों की वेदना का अनुवाद करदूं
मैं ये बोला राजपथ पर युद्ध लड़ना है मुझे." ------राजीव चतुर्वेदी
तुम ये बोले सच तो था पर संजीदा नहीं था
मैने पूछा वह भी कभी इतना तो पाकीज़ा नहीं था
मैंने भेजे शब्द सच के सैनिकों से रक्त रंजित
तुम ये बोले शब्द तो थे पर उनका उचित श्रिंगार नहीं था
मैं तो बोला था तरुणाई के माने युद्धों की अंगड़ाई है
मैं करुणा की पैमाइश करके क्रान्ति लिखा करता था
तुम कविता में कामुकता का रस घोल रहे थे
शब्दों का सौन्दर्य समझते तुम भी थे
शब्दों से मैं शौर्य उकेरा करता था
प्यार की प्यारी परिधियों की परिक्रमा कर तुम कहाँ पहुंचे ?
मैं केंद्र में था हर पराक्रम के
शब्द मेरे युद्धरत थे जिन्दगी की शाम को घायल से आते
उस समय तुम प्यार की पेंगें बढाने जा रहे थे
तुमने चाहा दुल्हनो से शब्द ही स्वीकार करलूं
मैं ये बोला जनपथों की वेदना का अनुवाद करदूं
मैं ये बोला राजपथ पर युद्ध लड़ना है मुझे." ------राजीव चतुर्वेदी
Saturday, March 24, 2012
उन्हें समझो तो कविता समझ लेना
"अँधेरे में उजाले और भूख में निवाले के बीच संवेदना की भगदड़ है,
कुछ शब्द बिखरे हैं, कुछ निखरे हैं उन्हें समझो तो कविता समझ लेना."
-----राजीव चतुर्वेदी
समंदर की सतह पर एक चिड़िया ढूंढती है प्यास को
"समंदर की सतह पर एक चिड़िया ढूंढती है प्यास को
अब तो जन - गण - मन के देखो टूटते विश्वास को
वर्फ से कह दो जलते जंगलों की तबाही की गवाही तुम को देनी है
और कह दो साजिशों से सत्य का चन्दन रगड़ कर अपने माथे पर लगा लें
और जितना छल सको तुम छल भी लो
लेकिन समझ लो ऐ जयद्रथ
वख्त का सूरज अभी डूबा नहीं है
एक भी आंसू हमारा आज तक सूखा नहीं है. " --- राजीव चतुर्वेदी
अब तो जन - गण - मन के देखो टूटते विश्वास को
वर्फ से कह दो जलते जंगलों की तबाही की गवाही तुम को देनी है
और कह दो साजिशों से सत्य का चन्दन रगड़ कर अपने माथे पर लगा लें
और जितना छल सको तुम छल भी लो
लेकिन समझ लो ऐ जयद्रथ
वख्त का सूरज अभी डूबा नहीं है
एक भी आंसू हमारा आज तक सूखा नहीं है. " --- राजीव चतुर्वेदी
Thursday, March 22, 2012
मैंने कुछ शब्द खरीदे हैं बाज़ार से खनकते से हुए
"कुछ शब्द भेजे थे तुम्हारे पास
राह में बैठे अभी वह हाँफते होंगे
जिन्दगी की राह में यादों के तुम पौधे लगाओ
आंसुओं की खाद दो, सींचो उन्हें तुम विवशताओं से अभी
एक दिन वह पेड़ बन कर छाओं देंगे भावनाओं को कभी
शब्द सौंदर्य का असीमित राग होते हैं
शब्द भावनाओं का भागीरथी प्रयास होते हैं
शब्द संस्कारों के हैं सारथी
शब्द हर मंदिर के हैं प्रार्थी
शब्द आराधना के रूप मैं हैं आरती
योजना वह भावनाओं की हों या भय की रूप रेखा
शब्द की सामर्थ्य समझो भी कभी
शब्द हर सभ्यता का आख़िरी हथियार होते हैं." ---- राजीव चतुर्वेदी (4April11)
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"मैंने जो शब्द तौले थे पलकों पर कभी
उन्हें तुम बोल पाए क्या ?
न बोलो,
चुप रहो,
हमारे बीच में शब्दों की जरूरत है भी क्या ? " ----- राजीव चतुर्वेदी
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" सहमे सुलगते शब्द सड़कों पे क्यों आने लगे,
गर्मियों में झुग्गीयाँ हर साल जलती हैं." ----- राजीव चतुर्वेदी
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" शब्द सिहर गए है
ठहर गए हैं
ठण्ड लग गयी है उन्हें
आग जलाओ शब्दों को तपाओ
आग में वह पिघलेंगे
आँख से वह निकलेंगे
जुबान पर आयेगे
होठ मुस्कुराएंगे
कलम से वो छलकेंगे
गीत से वो चहकेंगे
आग को सुलगाओ
समय की उदास भट्टी में
शब्दों को तपाओ
पिघलते शब्द अगर बहे तो सुलग जायेंगी शांत बस्तियां
शब्द लड़ाई की शुरूआत करते हैं
शब्द लड़ाई का आख़िरी हथियार होते हैं.
भाषा को लोरियां मत सुनाओ
ठन्डे शब्दों को सुलगाओ
एक और क्रान्ति करनी है इन्ही शब्दों को अभी." --- राजीव चतुर्वेदी
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" शब्द भूखे ही लौट आये हैं चरागाहों से इस शाम
और नदी भी हमारे बीच रेंगती है इस रात को
बांस के झुरमुट के सहारे खेत के उस ओर मेड़ों पर
चाँद रोटी सा सुन्दर नज़र आने लगा है."----राजीव चतुर्वेदी
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" शब्द छलके हथेली में रखे पानी की तरह,
अफ़सोस ये कि पूरे अफ़साने में जुबां खामोश रही." -- राजीव चतुर्वेदी
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"शब्द सत्ता के जब शामिल हों जरूरत के जनाजे में,
सत्य को ललकारता जब सायरन का शोर हो
न्याय के मंदिर की मैना मौन की मुद्रा में हो
और धृतराष्ट्र की नज़रों पे निर्भर यह हमारा राष्ट्र हो
तो समझ लो क्रांति अब बेचैन है भूगर्भ में भूकंप सी
गाव की पगडंडीयों से तुम ये कह दो राजपथ से पूछ्लें अब वह हिसाब."---- राजीव चतुर्वेदी
राह में बैठे अभी वह हाँफते होंगे
जिन्दगी की राह में यादों के तुम पौधे लगाओ
आंसुओं की खाद दो, सींचो उन्हें तुम विवशताओं से अभी
एक दिन वह पेड़ बन कर छाओं देंगे भावनाओं को कभी
शब्द सौंदर्य का असीमित राग होते हैं
शब्द भावनाओं का भागीरथी प्रयास होते हैं
शब्द संस्कारों के हैं सारथी
शब्द हर मंदिर के हैं प्रार्थी
शब्द आराधना के रूप मैं हैं आरती
योजना वह भावनाओं की हों या भय की रूप रेखा
शब्द की सामर्थ्य समझो भी कभी
शब्द हर सभ्यता का आख़िरी हथियार होते हैं." ---- राजीव चतुर्वेदी (4April11)
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"मैंने जो शब्द तौले थे पलकों पर कभी
उन्हें तुम बोल पाए क्या ?
न बोलो,
चुप रहो,
हमारे बीच में शब्दों की जरूरत है भी क्या ? " ----- राजीव चतुर्वेदी
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" सहमे सुलगते शब्द सड़कों पे क्यों आने लगे,
गर्मियों में झुग्गीयाँ हर साल जलती हैं." ----- राजीव चतुर्वेदी
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" शब्द सिहर गए है
ठहर गए हैं
ठण्ड लग गयी है उन्हें
आग जलाओ शब्दों को तपाओ
आग में वह पिघलेंगे
आँख से वह निकलेंगे
जुबान पर आयेगे
होठ मुस्कुराएंगे
कलम से वो छलकेंगे
गीत से वो चहकेंगे
आग को सुलगाओ
समय की उदास भट्टी में
शब्दों को तपाओ
पिघलते शब्द अगर बहे तो सुलग जायेंगी शांत बस्तियां
शब्द लड़ाई की शुरूआत करते हैं
शब्द लड़ाई का आख़िरी हथियार होते हैं.
भाषा को लोरियां मत सुनाओ
ठन्डे शब्दों को सुलगाओ
एक और क्रान्ति करनी है इन्ही शब्दों को अभी." --- राजीव चतुर्वेदी
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" शब्द भूखे ही लौट आये हैं चरागाहों से इस शाम
और नदी भी हमारे बीच रेंगती है इस रात को
बांस के झुरमुट के सहारे खेत के उस ओर मेड़ों पर
चाँद रोटी सा सुन्दर नज़र आने लगा है."----राजीव चतुर्वेदी
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" शब्द छलके हथेली में रखे पानी की तरह,
अफ़सोस ये कि पूरे अफ़साने में जुबां खामोश रही." -- राजीव चतुर्वेदी
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"शब्द सत्ता के जब शामिल हों जरूरत के जनाजे में,
सत्य को ललकारता जब सायरन का शोर हो
न्याय के मंदिर की मैना मौन की मुद्रा में हो
और धृतराष्ट्र की नज़रों पे निर्भर यह हमारा राष्ट्र हो
तो समझ लो क्रांति अब बेचैन है भूगर्भ में भूकंप सी
गाव की पगडंडीयों से तुम ये कह दो राजपथ से पूछ्लें अब वह हिसाब."---- राजीव चतुर्वेदी
Monday, March 19, 2012
तू अगर खुदा है तो खुद्दार मैं भी हूँ
"मेरे हक को तू नकार दे
मेरे हौसले का हिसाब दे
जो फासला था दरमियां
वह आज भी घटा नहीं
तू अगर खुदा है तो खुद्दार मैं भी हूँ में मजहबों में बंटा नहीं इबादतों से हटा नहीं
तू है देवता तो ये बता ये रास्ता क्यों अजीब है
गुनाह तो मेने नहीं किया फिर ये क्यों मेरा नसीब है
जहान में तू जहां भी है मुझे आज तक तू दिखा नहीं कभी तू कहीं मिला नहीं
तेरे बिना में कल भी था तेरे बिना में अब भी हूँ
ये वहम था मेरे जहन का जो आज तक मिटा नहीं ." --- राजीव चतुर्वेदी
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