Friday, April 6, 2012

आओ फरिश्तों से कुछ बात करें बहुत उदास है ये रात


"आओ फरिश्तों से कुछ बात करें
बहुत उदास है ये रात
कोहरे के लिहाफ ओढ़ कर शायद तुम हो जो झांकती हो मुंडेरों से अभी

चाँद की बिंदी लगा लो अपने माथे पर
समझलो तुम सुहागिन हो

तुम्हारी मांग में शफक सिन्दूर भर कर खोगई है भोर में
मैं लौट के आऊँगा देख लेना

तन्हाईयों में गूंजती रुबाईयों जैसा
धूप में सूखती रजाईयों जैसा
मैं लौट के आऊँगा देख लेना

हादसे में हाँफते सुबह के अखबार में सिमटा
देख लो तुम्हारी गोद में सर रखे सूरज सा लेटा हूँ मैं

एक रोशन सच चरागों से चुरा लाया हूँ मैं
तुम्हारी आँख में काजल लगा दूं रात का

मैं खो जाऊंगा तह किये कपड़ों में रखे स्नेह के सुराग सा
मैं याद आऊँगा सूनी मांग से सिन्दूर के संवाद सा 

तुम्हारी आँख में काजल लगा दूं रात का
मैं जाता हूँ सितारों ने बुलाया है दूर से मुझको

ओढ़ लो कोहरे की चादर
बहुत सर्द है रात.
"    ----राजीव चतुर्वेदी


वह जो रिश्ते सूख कर थे गिर गए


"वह जो रिश्ते सूख कर थे गिर गए,
पेड़ के पीले से पत्तों की तरह
झाड़ कर दालान से बाहर भी तुमने कर दिया
अब क्या कोपल उगेंगी फिर नए विश्वास की ?
वक्त की आंधी से जो अब गिर रहे हैं सूखे पत्ते से
वह रिश्ते हमारे
सुना है मिट्टी में मिल कर खाद बन जाते यहाँ हैं
इस खाद में फिर ख्वाब का पौधा उगेगा
पत्तीयाँ उसमें भी होंगी
सभ्यता के इस सफ़र में सहमते लोगो सुनो तुम
वह जो रिश्ते सूख कर थे गिर गए,
पेड़ के पीले से पत्तों की तरह
झाड़ कर दालान से बाहर भी तुमने कर दिया
अब क्या कोपल उगेंगी फिर नए विश्वास की ?" ----राजीव चतुर्वेदी

Thursday, April 5, 2012

हर मेहनतकश को गधा कह रहे शातिर सुन

"यह सौन्दर्य असीम प्रभु की यह भी कृति है,
यह खोट नज़र की मेरी ही है जो विकृत है.
हर मेहनतकश को गधा कह रहे शातिर सुन
घूसखोर को सत्यापित करती यह संस्कृति है."
                                 ---- राजीव चतुर्वेदी 

आहत है वह

"मैं नहीं हूँ अब वहां
हो सके तो अक्स को अहसास दो
  आहत है वह."

-----राजीव चतुर्वेदी 

हर हरामखोर के चेहरे पे नूर था

"सब जानते हैं वह गटर थी,
गंगा में क्या मिली कि उसको गुरूर था. 
वह लड़खड़ा गया था किसी हादसे को सुन,
लोगों की राय में उसको सुरूर था.
वह घूसखोर जिसके लिए पेशकार ले रहा था घूस,
वकीलों की अब निगाह में वह भी हुजूर था.
मेहनतकशों के मुकद्दरों में थीं मायूसियां लिखी,
 हर हरामखोर के चेहरे पे नूर था. "                ----राजीव चतुर्वेदी   

Wednesday, April 4, 2012

तह करके रख ले अपना आसमान ऊपर वाले

"मुझे फक्र है मेरे पाँव ज़मीन पर हैं,
तह करके रख ले अपना आसमान ऊपर वाले."
----राजीव चतुर्वेदी

Tuesday, April 3, 2012

प्यार के छल की नमी क्यों नापते हो

"मेरी आवाज़ खो जाने दो अंधेरों में,
अनंतों की अवधि क्यों नापते हो .
आसमानों का अहसास तो है हमको
असमानों से आस तो है ओस जैसी
सत्य का सूरज जब हो निगाह में तेरी
प्यार के छल की नमी क्यों नापते हो." -- राजीव चतुर्वेदी 

Sunday, April 1, 2012

ये कविता मेरी है गर वेदना तेरी हो तो बताना तू भी मुझको

" यह विम्ब बिखरेंगे तो अखरेंगे, अखबार बन जायेंगे
समेटोगे तो आंसू पलकों पे गुनगुनाएगे ,
अमावस को तारे भी अवकाश में हैं
मुसाफिर सो गए हैं सोचते सुनसान से सच को
यह सच है कि सूरज डूबा था महज हमारी ही निगाहों में
 चीखती चिड़िया का चेहरा और गिद्धों का चरित्र
फूल की पत्ती पे वह जो ओस है अक्स आंसू का
यह विम्ब बिखरेंगे तो अखरेंगे अखबार बन जायेंगे
समेटोगे तो आंसू पलकों पे गुनगुनाएगे
सहेजोगे तो कविता कागजों पर शब्द बन कर वेदना का विस्तार नापेगी
वह जो घर पर आज सहमी सी खड़ी है छोटी बहन सी भावना मेरी
आसमान को देखती है एक चिड़िया सी
उसकी निगाहों में सिमटा आसमान शब्दों में समेटो तो नदी की मछलियाँ भी मुस्कुरायेंगी
पीढियां भी संवेदना की साक्षी बन कर तेरी कविता गुनगुनायेंगी
यह विम्ब बिखरेंगे तो अखरेंगे, अखबार बन जायेंगे
समेटोगे तो आंसू पलकों पे गुनगुनाएगे.
ये कविता मेरी है गर वेदना तेरी हो तो बताना तू भी मुझको
यह विम्ब बिखरेंगे तो अखरेंगे अखबार बन जायेंगे
समेटोगे तो आंसू पलकों पे गुनगुनाएगे." ----राजीव चतुर्वेदी

सहमती शाम का सूरज संकोची सा नज़र आया

"सहमती शाम का सूरज संकोची सा नज़र आया
रात में दहशत अँधेरा ओढ़ के बैठी रही 
शब्द लाशें बन के सुबह बिखरे थे अखबार में
दिन के सूरज की उंगली पकड़ के मैं निकला था घर से
शाम होते मैं कहीं गुम हो गया था 
जिन्दगी की इस तश्वीर को तहरीर मत समझो
आज मेरे खून से तर दिख रहे हैं उन्हीं काँटों पर
दर्ज होना चाहती हैं खूबसूरत सी खरासें."          -----राजीव चतुर्वेदी

उन बहते शब्दों को लोग कहेंगे कविता है यह

"कुछ कविता की पैरोडी कहने के आदी हैं
पहले कविता का गबन किया फिर वमन किया कुछ शब्दों का
मौलिकता का सौंधापन तो स्वाभाविक समझा जाता है
शब्दों की सामर्थ्य, शास्त्र की समझ, प्रतीकों का पैनापन
अंगारों की आग, झुलसती बस्ती, दावानल से दूर पिघलती वर्फ पहाड़ों की
छा जाती है जब अंतर्मन में कोलाहल सी तो कविता आहट करती है खामोशी से
जो इत्र दूसरों से ले कर ही महके हैं
बेचारे इतने हैं कि हर विचार पर बहके हैं
कागज़ के फूल टिके हैं बरसों तक, पर हर बसंत में बेबस है
हम तो जंगल के पौधे से हैं खिले यहाँ मिट जाएँगे
चर्चे मेरी मौलिकता के बंगले के गमले गायेंगे
ये पैरोडी के गीत गुनगुनाने वाले सुन
कोयल की पैरोडी कौओं के बस की बात नहीं
कुछ चिंगारी, कुछ अंगारे, कुछ तारे, कुछ सूरज , थोड़ा सा चन्दा, शेष चांदनी
धूल गाँव की, शूल मार्ग के, भूखा पेट, उदास चूल्हे की चीख चीरती है जब दिल को
इतिहासों के उपहासों के तल्ख़ तस्करे,
वह महुआ की तरुणाई, प्यार का मुस्काना, वह नागफनी का दंश, वंश बबूलों का
वह नाव नदी मैं तैर रही आशंकित सी,
दूर चन्द्र के आकर्षण से लहरों का शोर मचाते सागर का भी इठलाना
वह देवदार के पेड़, चिनारों के पत्ते, वह मरुथल की झाड़ी में खरगोशों का छिप जाना
वह बहनों की मुस्कान अमानत सी मन में, वह बेटी का गुड़िया पर ममता जतलाना
वह नन्हे से बच्चे को ममता का घूँट पिलाती माताएं
वह बाहर जाते बेटे को बूढ़ी आँखों का उल्हाना
वह संसद में बेहोश पड़ा सच भी देखो
मकरंदों की बातें भौरों को करने दो
इन सब तत्वों पर तेज़ाब गिराओ अपने मन का
जो धुंआ उठेगा वह कविता बन जाएगी
जो रंग बनेगा वह तेरी कविता का मौलिक रंग कहा जाएगा
जो राग उठेगा उसको पहली बार सुना होगा तुमने
यह राग रंग की आवाजें जब गूंजेंगी तो शब्द बहेंगे
उन बहते शब्दों को लोग कहेंगे कविता है यह." ----राजीव चतुर्वेदी