Wednesday, May 7, 2014

मैं मुक्तक से मुक्त हुआ अब कविता तुम ही कर लेना

"मैं मुक्तक से मुक्त हुआ अब कविता तुम ही कर लेना ,
मैं चेतना और वेदना का अनुवाद करने जा रहा हूँ
तुम शब्दों में तुकबंदी ढूंढो
तुकबंदी में सत्य सदा तुतलाता रहता
भाषा के व्याकरण तलाशो
अलंकार के हर प्रकार में उलझाओ तुम सच को जितना
दोराहे पर खड़ी वेदना चीख रही है
शब्दों के सांचे में उसको ढाल रहे हैं वह तो 'सच' को सचमुच मार रहे हैं
वेदना के सांचे में शब्दों को ढालो
चीख उठोगे जिस भाषा में कविता उसमें बन जायेगी
इस शब्दों को पीटो अपनी पीड़ा से तुम ...पैने थोड़े बन जायेंगे
उनसे तुम तलवार बनाओ
शब्द ढलें तो ढाल बनाओ
तितली से कह दो वह तलवारों की धार पर बैठे
फूलों पर ही नहीं वह उपवन के हर खार पर बैठे
युद्ध क्षेत्र मैं पतझड़ की पैमाइश करता है बसंत जब ...कविता की खेती होती है
ऐसी कविता शंखनाद का घोष करेगी
तुकबंदी में तुतलाती कविता तर्क तथ्य और सत्य से कितनी दूर खड़ी है
अंगारों पर श्रंगारों की खेती मत कर
शब्दों के संकोचित सहमे से हर रिसाव में बहती कविता जन कविता है
तुम तुकबंदी कर चापलूस से चालीसे लिखना
मेरे शब्द समर्पित उसको
मैं मुक्तक से मुक्त हुआ अब कविता तुम ही कर लेना ,
मैं चेतना और वेदना का अनुवाद करने जा रहा हूँ ." ----- राजीव चतुर्वेदी

Monday, January 27, 2014

जब लोकतांत्रिक समुद्र -मंथन होता है तो ? ...

"जब लोकतांत्रिक समुद्र -मंथन होता है तो सुर भी निकलता है , सुंदरियां भी , शौर्य भी , विष भी ,अमृत भी . सवाल यह है कि जन -गण -मन किसका चयन करता है ? सवाल यह है कि सदैव सुविधा की घात में बैठे देवता कौन हैं ? राहू -केतु कौन हैं ? कौन हैं हमारे घावों पर मरहम लगाने वाला महरबान धन्वन्तरी ? कौन है अप्सरा ? अमृत पर कौन है घात में, किसके हाथ में है सुरा ? हम सही पहचान कर सकें ...धोखा न खाएं . हर युग में एक शिव होता है जो समाज के फैले विष को पीता है पर सुकरात की तरह मरता नहीं , जीता है .---- हम उस शिव को पहचान सकें . --- शुभ कामना !!" ---- राजीव चतुर्वेदी

Sunday, January 26, 2014

यह खनक कैसी हुयी ? कुछ गिरा क्या ?

" मैं जिन्दगी मैं दौड़ता जा रहा था
यह खनक कैसी हुयी ?
कुछ गिरा क्या ? ...देखता हूँ ...उठाता हूँ ...
अरे यह आत्मा मेरी गिरी है मुझसे निकल कर
कहती है मुझे आना ही होगा फिर कभी ...आऊँगी भी
नए कपडे पहन कर
तेरा सफ़र रुकता है अब ...मेरा सफ़र जारी हुआ
जिन्दगी की शाम का वक्तव्य है यह ...रात बाकी है
सुबह फिर अर्ध्य देना है तुम्हें उगते हुए सूरज को
और उस उगते हुए सूरज मैं शुभकामना भी शामिल हैं
मेरी भी ...तुम्हारी भी .
" ------ राजीव चतुर्वेदी

Thursday, January 16, 2014

मेरी कविता में ...



"मेरी कविता में चाँद चांदनी घुँघरू पायल घायल नहीं होते
मेरी कविता में रातरानी ,बेला , चिनार या कोई छिनार भी नहीं होते
मेरी कविता में मुम्बैया रण्डी भडुए तबले सारंगी भी नहीं होते
मेरी कविता में रात ढलते ही खौफजदा माएं होती हैं
मेरी कविता में पत्नी की आशाएं होती हैं

मेरी कविता में चन्दा को मुठ्ठी में कैद किये कुछ बच्चे होते हैं
मेरी कविता में सेना के मृत जवान पर परिजन रोते हैं
मेरी कविता में सूरज के साथ उठ खडा किसान होता है
मेरी कविता में अनुदान की कातर कतारें नहीं होतीं
अधिकार माँगता नौजवान होता है
मेरी कविता में शंका कम, समाधान होता है
मेरी कविता में आचरण होता है, आचरण का व्याकरण होता है
मेरी कविता में पर्यावरण होता है और उससे चिंतित तितली होती है
मेरी कविता में नागफनी के फूल, बबूलों के कांटे हैं
मेरी कविता में कुछ सपने भी हैं जो हमने बांटे हैं
मेरी कविता में वेदान्त नहीं, वेदना है
मेरी कविता में तुम्हारा रूप छल पर चढ़ा आवरण है
रूप अगर निश्छल है तो नुमाईश कैसी ?
रूप अगर आखेट का चुगा है तो उसकी भी तो बात हो जिसको तैने ठगा है
मेरी कविता में युद्ध है, कलह नहीं
मेरी कविता में प्रयास है, प्रलय नहीं
मेरी कविता में माँ है , पिता हैं , बहने हैं भाई हैं
दादा हैं दादी हैं स्मृतियाँ हैं
मेरी कविता में यंत्रों की गतियाँ हैं
मेरी कविता में कलकल बहती नदियाँ हैं
मेरी कविता में कलेंडर पर सूली में चढी सदियाँ हैं
मेरी कविता में अनुदान नहीं आन्दोलन हैं
कृपा बटोरने को फैले हुए हाथ नहीं, बंधी हुयी मुट्ठी है
मेरी कविता में उद्योगों की भट्टी है
मेरी कविता में सूना चूल्हा है, दहेजखोर दूल्हा है
मेरी कविता में राग है ,मेरी कविता में आग है
मेरी कविता में टूटते दायरे हैं ...ढहती हुयी दीवार हैं
और वह ईंट भी है जो हर क्रान्ति का आख़िरी हथियार है ."
----- राजीव चतुर्वेदी



शताब्दियों बाद जब इस देश का इतिहास लिखा जाएगा तब

" शताब्दियों बाद जब इस देश का इतिहास लिखा जाएगा तब इतिहासकारों द्वारा इस देश के उपहासकारो का चर्चा होगा ...लिखा जाएगा भारत मुगलों, अंग्रेजों के अलावा इटली का भी गुलाम रहा ...सभी सरदार राष्ट्र भक्त और स्वाभिमानी नहीं होते कुछ मनमोहन सिंह जैसे भी होते हैं ...अमेरिका के परखनली शिशु को भारत में प्रधानमंत्री बनाने के प्रयोग का सिलसिला मनमोहन प्रयोग की अपार सफलता के बाद जारी था और इसके लिए फोर्ड फाउउंडेशन 'आप ' की बाप थी ...नक्सलाईट के सर्वश्रेष्ठ शहरी वकील को मेगासेसे अवार्ड दिया जाता था किन्तु इस काम में संदीप पाण्डेय फिसड्डी और केजरीवाल अव्वल थे ...कुछ ख़ास आदमियों ने 'आम आदमी पार्टी ' बनायी थी जिसमें आम आदमी गुमनाम था ...कोंग्रेस के सोनियाँ काल में उनके दामाद रोबर्ट्स बढेरा की भूमिका कम और भूमि अधिक हो गयी थी . सोनियाँ भारत में सबसे बड़ा विदेशी निवेश थीं और उनके अपनी ससुराल के स्वर्णिमकाल में बोफोर्स से ले के वेस्टएण्ड हैलीकोप्टर तक हर बड़ी 'डील' का नाभिकीय केंद्र इटली था ...भाजपा अपने भरोसे कभी नहीं रही , कभी राम भरोसे थी कभी मोदी भरोसे . ...नीतिश कुमार बिहार का आख़िरी मुग़ल शासक था ...मुलायम सिंह सत्ता का हसीन सपना देखने वाले आख़िरी मुंगेरी लाल थे ...दिग्विजय सिंह को अपने मुग़ल होने का मुगालता था और मुगलों का मानना था कि अपनी कौम से दगा करने वाला किसी का सगा नहीं हो सकता ...बच्चे निबन्ध लिखेंगे कि आतंकियों के मुकदमें वापस लेने के प्रयास से अखिलेश अल -कायदा को क्या फ़ायदा दे सके . इनकी समाजवादी सरकार में 'समाज' सहमा हुआ था और 'वाद' बकैती कर रहा था . क़ानून व्यवस्था में आम आदमी आतंकित था और आतंकियों को सरकार जेल से बाहर निकालने की जुगत में थी जैसे जेल आतंकियों के लिए नहीं आतंकितों के लिए बनी हो ...कश्मीर भारत का हिस्सा कम मुग़ल सल्तनत अधिक थी ...रजिया सुलतान की तरह एक थीं कांसीराम की बहन मायाबती किन्तु रजिया की तरह वह गुण्डों में कभी नहीं फंसी सिवा गेस्ट हाउस काण्ड के ...उच्च न्यायालय का जज बनाने की जुगत जिस्मानी भी थी रूहानी भी और कहानी भी . महेश्वरी आढ़त के अलावा अभिषेक मनु सिंघवी के योग शिविर में भी चरित्र का अनुलोम विलोम करना पड़ता था ...लश्कर -ऐ -तैयबा की आत्मघाती इशरत जहाँ को मार गिराने वाले पुलिस अधिकारियों पर मुकदमा चलाया गया था ...मंहगाई से त्रस्त हरजिंदर का थप्पड़ खाने के बाद शरद पवार का राजनीतिक पतन शुरू हो गया था ...ह्त्या कर रहे नक्सलियों के मानवाधिकार सब पर भारी थे ...भारत देश में दूसरे नम्बर के बहुसंख्यकों को अल्पसंख्यक कहा जाता था ...संविधान जातिप्रथा को वर्जित करता था किन्तु जाति के आधार पर आरक्षण दिया जा रहा था ... सामाजिक न्याय से प्रेरित भेंसों और गधों ने घुडदौड़ में अपनी आबादी के हिसाब से आरक्षण की माँग की थी ...हर नया संसदीय सत्र पुराने घोटाले को भूल कर नए घोटाले पर चर्चा करता था और उस अन्जाम तक न पहुँचने वाली चर्चा पर खूब खर्चा करता था ...जिस खेल को विश्व के दस प्रतिशत देश भी नहीं खेलते थे उस क्रिकेट की भारत में लोकप्रियता थी ...क्रिकेट और फिल्म से देश के नायक आ रहे थे और यह क्रिकेट और फ़िल्मी नायक दरअसल एक खलनायक दाउद इब्राहिम के गुर्गे थे ...देश में कुछ घोटालेबाज चटवाल, कुछ घोषित आतंकी , कुछ दाउद की मुम्बईया फ़िल्मी रखेलें भी पद्म पुरुष्कार पा रही थीं ...यों तो इस कालखण्ड देश हत्यारों से आक्रान्त था पर फिर भी कुछ लोग गांधी जी की ह्त्या को जायज ठहरा रहे थे और हत्यारे गौडसे को महिमा मंडित कर रहे थे, तो दूसरे लोग नक्सली हत्यारों को जायज ठहरा रहे थे, तीसरे लोग इस्लामिक आतंकवादीयों के कातिलों के कसीदे पढ़ रहे थे , अपनी सामूहिक हत्याओं से छुब्ध एक समुदाय के लोग स्वर्ण मंदिर में भिण्डरावाले जैसे कातिल को महिमामंडित कर संतों /गुरुओं के समकक्ष रख रहे थे कुल मिला कर पूरे राष्ट्र में कातिलों के पक्ष में क़त्ल हो रहे लोग लामबंद हो रहे थे ...हिन्दुओं के छह हजार मंदिर तोड़ने का कोई चर्चा नहीं था पर इससे उकताए लोगों ने जब एक बाबरी मस्जिद तोड़ दी तो अंतरराष्ट्रीय श्यापा था ...हिन्दूओं में लोग अपनी बेटी का नाम 'रति' रखते थे और मुसलमानों में 'सूफियान' जैसे नाम बहुत प्रचलित थे पर इस्लाम के लिए बहुत कुछ करने वाले नाम 'औरंगजेब' का प्रचलन ही ख़त्म हो चुका था ...कोई अपनी औलाद का नाम 'औरंगजेब' नहीं रखता था ...राष्ट्र में एक महाराष्ट्र भी था जहां जहाँ देश के अन्य प्रान्तों के लोग उतने ही असुरक्षित थे जितने भारतवासी ऑस्ट्रेलिया में ...और ...और इतिहास में यह भी शायद इस बार लिखा जाए क़ि इस बार भी इतिहासकार उतने ही वैचारिक बेईमान थे जितने पहले के इतिहासकार ...इतिहासकार गुजरे समय की सीवर की सफाई करते रहे हैं उन्होंने गुजरे समय के सूरज की समीक्षा ही कब की है ?" ----- राजीव चतुर्वेदी

Monday, January 13, 2014

फसल ...

"फसल ...
खडी होने तक हर हरामखोर फासले पर रहता है
और अपने बच्चों से भी फसल से फासला रखने को कहता है
फसल की प्यास छीन कर वह स्वीमिंगपूल में पानी भरता है
फसल में शामिल है किसान की उदासी
फसल में शामिल है नहर की खंती
फसल में शामिल है सूरज की किरण और उसमें पकता हुआ किसान
फसल में शामिल है नीलगाय से जूझता किसान
फसल में शामिल है किसान का वह पसीना
जिसको क्या समझेगी कोई हरामखोर हसीना
फसल में शामिल है पाताल का पानी और थोड़ी ओस
फसल में शामिल है आढ़तिये की मक्कारी और किसान का जोश
कुछ हवा ...थोड़ी चांदनी ...सहेज के रखा गया किसान की बेटी का दहेज़
फसल में शामिल है किसान के बच्चे के मटमैले से सपने
फसल में शामिल हैं किसान के कुछ अपने
फसल में शामिल है टाट -पट्टी के स्कूल की भी न चुकाई गयी फीस
फसल में शामिल है गाय का रम्भाना ...बैल का मर जाना
...ट्रेक्टर की कमर तोडती किश्त
यों समझ लो कि फसल में पूरी सृष्टि और थोड़ी वृष्टि शामिल है
फसल में शामिल है पूरी की पूरी कायनात
फसल में नहीं शामिल हैं कोई अर्जुन ...कोई नागार्जुन ...हम और आप
हम शामिल हो जायेगे तो यह साहित्यिक लफ्फाजी कौन करेगा ?
फसल ...
खडी होने तक हर हरामखोर फासले पर रहता है
और अपने बच्चों से भी फसल से फासला रखने को कहता है . " ---- राजीव चतुर्वेदी

Sunday, December 22, 2013

मैं हवा हूँ मेरे मित्र ,मेरे साथ चाहो तो बहो वरना घरों में चुपचाप रहो

" मैं हवा हूँ मेरे मित्र
मेरे साथ चाहो तो बहो
वरना घरों में चुपचाप रहो
तुम पर दर ...उस पर बाजे से बजते दरवाजे हैं
हर मौसम में खीसें निपोरती खिड़कियाँ हैं
मौसम को कमरे में बंद करने का दंभ है
सांसारिक सम्बन्ध है ...काम का अनुबंध है ...सुविधाओं का प्रबंध है
संवेदनाओं का पाखंडी निबंध है
जिसमें शब्दों की बाढ़ किनारे छू कर लौट आती है हर बार
मैं हवा हूँ मेरे मित्र
मेरे पास अपना कुछ भी नहीं
न दर है न दरवाजा न खिड़की न रोशनदान कोई
कोई बंधन भी नहीं
बहते लोगों के सम्बन्ध नहीं होती
स्वतंत्र लोगों के अनुबंध नहीं होते
निश्छल लोगों के प्रबंध नहीं होते
निर्बाध वेग का निबंध कैसा ?
मैं हवा हूँ मेरे मित्र
मेरे साथ चाहो तो बहो
वरना बाहर के कोलाहल से
अपने अन्दर के सन्नाटे का द्वंद्व सहो
और कुछ न कहो

देखना एक दिन मैं अपने प्रवाह में लीन हो जाऊंगा
और तुम अपने ही अथाह में विलीन हो जाओगे
तब यह दर ...यह दरवाजे ...यह खिड़कियाँ
तुम्हें हर पूछने वाले से कह देंगे
बहुत कुछ सह गया है वह
हवा में बह गया है वह
चुपके से ." ----- राजीव चतुर्वेदी

Thursday, December 19, 2013

कविता के लिए जरूरी है जिन्दगी के पार निकल जाना

"कविता के लिए जरूरी है जिन्दगी के पार निकल जाना
और अन्हादों को गुनगुनाना
मरा हुआ व्यक्ति कविता नहीं समझता
मरे हुए शब्द कविता नहीं बनते
ज़िंदा आदमी कविता समझ सकता ही नहीं
ज़िंदा शब्द कविता बन नहीं सकते
कविता के लिए जरूरी है जिन्दगी के पार निकल जाना
और अन्हादों को गुनगुनाना
इस लिए भाप में नमीं को नाप
अनहद की सरहद मत देख हर हद की सतह को नाप
कविता संक्रमण नहीं विकिरण है
आचरण का व्याकरण मत देख
शब्देतर संवाद सदी के शिलालेख हैं
उससे तेरी आश ओस की बूंदों जैसी झिलमिल करती झाँक रही है
जैसे उडती हुयी पतंगें हवा का रुख भांप रही हैं
नागफनी के फूल निराशा की सूली पर
और रक्तरंजित सा सूरज डूब रहा है आज हमारे मन में देखो
उसके पार शब्द बिखरे हैं लाबारिस से
उन शब्दों पर अपने दिल का लहू गिराओ
कुछ आंसू मुस्कान मुहब्बत मोह स्नेह श्रृगार मिलाओ
शेष बचे सपने सुलगाओ उनमें कुछ अंगार मिलाओ
अकस्मात ही अक्श उभर आये जैसा भी
गौर से देखो उसमें कविता की लिपि होगी 
कविता के लिए जरूरी है जिन्दगी के पार निकल जाना
और अन्हादों को गुनगुनाना ." ----- राजीव चतुर्वेदी

Saturday, December 14, 2013

मैंने इश्क की इबादत कब की ?

"मैंने इश्क की इबादत कब की ?
ये रवायत थी कवायद कब की ?
मैंने तो सोचा था इश्क से महकेगी फिज़ा
मैंने सोचा था कुछ फूल यहाँ महकेंगे
मैंने तो सोचा था कुछ जज़वात यहाँ चहकेंगे
मैंने सोचा था चांदनी ओढ़े हुए कुछ ख्वाब खला में होंगे
मैंने सोचा था इकरा तेरे रुखसार का उनवान होगी
मैंने सोचा था तेरे बदन की खुशबू मेरी मेहमां होगी
मैंने चन्दा को समेटा था तेरे माथे पे बिंदी की जगह
तू इबादत थी या आदत मेरी,-- सहमी हुयी शहनाई से भी पूछ ज़रा
तू शराफत थी या शरारत मेरी,-- तन्हाई से भी पूछ ज़रा
मैंने इश्क की इबादत कब की ?
यह महज शब्द है अल्फाजों में सिमटा सा हुआ
अब इसे अहसास उढा कर मैं सो जाऊंगा." ----राजीव चतुर्वेदी

Thursday, December 5, 2013

सुनो... तुम पूछती हो न कि तुमसे कितना प्यार करता हूँ मै....??


"सुनो...
तुम पूछती हो न कि
तुमसे कितना प्यार करता हूँ मै....??

यह तुमने क्या किया ?
मैं कहना तो चाहता था "असीम "
पर रिश्तों की दीवारें लाँघ कर आतीं
हर रिश्ता एक सीमा है
एक प्रकार है
एक संस्कार है 

एक प्राचीर है जिसकी अपनी ही दीवार है
एक अवधि है
एक परिधि है
यह तुमने क्या किया ?
एक रिश्ते के नाम में एक अहसास को सीमित किया
मैं तुमसे असीम प्यार करना चाहता था
पर यह तुमने क्या किया ?
हमारे अस्तित्व के बीच बहती हवाओं से एक अनवरत अहसास को
एक रिश्ते का नाम दिया --- यह तुमने क्या किया ?
तुम बेटी हो सकती हो
बहन हो सकती हो
पत्नी हो सकती हो
प्रेमिका हो सकती हो
तुम कुछ भी हो सकती हो पर सीमाओं में
इसी लिए मैं तुमसे सीमित प्यार करता हूँ
असीम नहीं

सुनो...
तुम पूछती हो न कि
तुमसे कितना प्यार करता हूँ मै....??

यह तुमने क्या किया ?
मैं कहना तो चाहता था "असीम "
पर रिश्तों की दीवारें लाँघ कर आतीं
। " ---- राजीव चतुर्वेदी

तुम कभी भी वह नहीं थे जो मैंने तुम्हें समझा

"तुम कभी भी वह नहीं थे जो मैंने तुम्हें समझा
फिर भी यह मरीचिका और मृगतृष्णा का रिश्ता था और रास्ता भी एक
परिभाषा और अभिलाषा के बीच प्रतीत की पगडण्डी का परिदृश्य प्रश्न है
तो उत्तर कैसा ?
जो लोग सूरज की रोशनी में रास्ता नहीं देखते

वह पूछते हैं ध्रुवतारे से सप्तर्षि की पहेली
सभ्यता की हर शुरूआत में प्रश्न प्रतीकों में अंगड़ाई लेता है
हर सुबह के गुनगुनाते सूरज का गुनाह है यह
तुमने कुछ कहा ही नहीं और मैंने सुन लिया
सत्य के संकेत उगते हैं निगाहों में।
" ----- राजीव चतुर्वेदी

Wednesday, October 16, 2013

अल्लाह की आँख में धूल मत झोंक लल्ला !! ईद -उल-जुहा मुबारक !!

" अल्लाह की आँख में धूल मत झोंक लल्ला .कुर्बानी का मतलब है किसी अपने अजीज की कुर्बानी . यह क्या हुआ कि शाम को बकरी खरीदी और सुबह काट डाली और चिल्लाने लगे कुर्बानी ...कुर्बानी ... दरअसल कुर्बानी तो बकरी देती है ...अपनी जान की कुर्बानी और आप उसका गोस्त खा कर जश्न मना कर चिल्लाते हो कुर्बानी ...आपने कौन सी कुर्बानी दी है ? ...यह बकरी की कुर्बानी नहीं उस मासूम शान्तिप्रिय शाकाहारी विवश जानवर के साथ विश्वासघात है ...और अगर इसे कुर्बानी कहते हैं ...और अगर इस कुर्बानी से सबब मिलता है ...अल्लाह खुश होता है ...तो इज़राइल और अमेरिका तो तुम्हारी चुन -चुन कर कुर्बानी देते हैं ....जैसे तुम मासूम अहिंसक बकरी /ऊँट /भेड़ का क़त्ल करते हो और कहते हो कुर्बानी वैसी तो कुर्बानी इज़राइल और अमेरिका अक्सर करते हैं ...उनको भी इस कथित कुर्बानी का सबब मिलता होगा तभी तो यह देश फल-फूल रहे हैं, सरसब्ज हैं, खुशहाल हैं, बरक्कत कर रहे हैं . खुदा की आँख में धूल झोंकने वालो खुद से पूछो किस अज़ीज की कुर्बानी दी है ...दीन के लिए क्या कुर्बानी दी है ?...ईमान के लिए क्या कुर्बानी दी है ? 

"झूठ झटके का था इसलिए नहीं खाया उसने,
सच को उसने सचमुच हलाल कर डाला ."
!! ईद -उल-जुहा मुबारक !! " ----- राजीव चतुर्वेदी


Saturday, September 28, 2013

आओ कुछ ख्वाब खरीदें उसी मण्डी से

" आओ कुछ ख्वाब खरीदें उसी मण्डी से
जहाँ हम बिक रहे हैं रोज टुकड़ों में
कहो, कैसा लगा यह सत्य सुन कर ?
शाम का सूरज अस्त होता है पराजित सा
रात को जब चांदनी चर्चा करेगी
तो उसमें तुम्हारी वेदना भी गुमशुदा होगी
ये रंगीन रातें उनकी हैं और ग़मगीन सुबह तुम्हारी है
सुना है ये धरती घूमती है
तो धरती के सभी सिद्धांत भी तो घूमते होंगे
इस घूमते भूगोल के अक्षांश से पूछो
हमारी वेदना की व्याख्या
जिन्दगी की भूमध्य रेखा से और कितनी दूर तक फ़ैली हुयी है 
और हर देशांतर का टापू एक मण्डी सा सजा है
देह से ले कर वहाँ पर स्नेह बिकता है --- खरीदोगे ?
चले आओ
आओ कुछ ख्वाब खरीदें उसी मण्डी से
जहाँ हम बिक रहे हैं रोज टुकड़ों में
कहो, कैसा लगा यह सत्य सुन कर ?"
  ---- राजीव चतुर्वेदी

Thursday, September 5, 2013

उस मोहल्ले के कुत्ते शान्ति पर बहुत भोंकते हैं

" उस मोहल्ले के कुत्ते शान्ति पर बहुत भोंकते हैं
आज कुछ कुत्तों ने शान्ति को काट लिया
मुकदमा चला
शान्ति से कुत्तों के वकीलों ने लम्बी जिरह की
यह कि कुत्तों का भोंकना तो उनका अभिव्यक्ति का अधिकार है 
और कुत्तों की मजहबी आस्था को ठेस पहुंचाने पर वह काट भी सकते हैं
संवैधानिक सा असंवैधानिक सवाल यह भी था
कि शान्ति किसने पहले भंग की ?
 काटने वालों ने या काटे जाने पर चीखने वालों ने ?"
---- राजीव चतुर्वेदी

Wednesday, August 14, 2013

खाद्य सुरक्षा बिल-- देश की भूख में वोट नहीं तलाशिये


"Food Security Bill यानी खाद्य सुरक्षा बिल ...अच्छा झुनझुना है ...पेप्सी की तरह देश को पिलाया जा रहा है जिससे पोषण कुछ भी नहीं डकार जोरदार आ रही है ...वह यही चाहते हैं ...वह चाहते हैं आप भूखे न मरें क्योंकि भूखा मरता आदमी विद्रोह कर देता है ...वह यह भी नहीं चाहते कि आप भरे पेट हों क्योंकि भरे पेट आदमी अपने अधिकार, नीति, सिद्धांत, राष्ट्रवाद की बात करता है ...वह चाहते हैं कि आप भूख से पूरी तरह नहीं मरें थोड़े से ज़िंदा भी रहें ताकि उन्हें वोट दे सकें ...वह चाहते हैं आप अधमरे रहें ...अधमरा कुपोषित नागरिक राशन की दुकान या वोटर की कतार में कातर सा खड़ा पाया जाता है आन्दोलन नहीं करता . उसे अखबार की ख़बरें नहीं अखरतीं ...उसे दूरदर्शन पर राष्ट्रीय दर्द नहीं देखना ...वह जब कभी दूरदर्शन देखने का जुगाड़ कर पाता है तो अपनी जिन्दगी में कुछ समय को ही सही कुछ सुखद कल्पनाएँ आयात कर लेता है ...उसे रूपये का अवमूल्यन, पेट्रोल की कीमत , टेक्स की दरें, शिक्षा का मंहगा होना, फ्लेट का मंहगा होना, घोटाले या रोबर्ट्स बढेरा जैसों का समृद्धि का समाज शास्त्र प्रभावित नहीं करता ...वह यही चाहते है इसीलिए वह चाहते हैं भूखे पेट कुपोषित अधमरा आदमी जो महज वोटर हो नागरिक नहीं . अगर खाद्य सुरक्षा ही देनी है तो नौ साल गुजर गए इस गए गुजरे मनमोहन की सरकार को क्या कृषि को लाभकारी बनाने की कोई योजना आयी ? खेतों में अन्न की जगह अब प्लौट उग रहे हैं इस विनाश को नगर विकास बताते तुगलको जब आबादी बढ़ेगी और खेत कम हो जायेगे तो कैसे पेट भरेगा ...तब कृषि उत्पाद महगे तो होंगे पर किसान के यहाँ नहीं आढ़ततिये के गोदाम पर और मालदार आदमी वह खरीद लेगा गरीब फिर भूखा मरेगा ...जैसे गाय /भैंस का दूध उसके बच्चे से ज्यादा हमारे बच्चे पीते हैं ...गाँव के बच्चों से ज्यादा शहर के बच्चे घी /मख्खन खाते है ...वह यही चाहते हैं . --- देश की भूख में वोट नहीं तलाशिये कृषि को लाभकारी बनाइये ...यह आपके राहुल, आपकी प्रियंकाएं या प्रियंकाओं के रोबर्ट्स केवल अपना पेट भरते हैं ...देश का पेट तो किसान भरता है ---उसके लिए क्या किया ?" ---- राजीव चतुर्वेदी


Monday, August 12, 2013

तुम्हारी लम्बी सी जिन्दगी में

"तुम्हारी लम्बी सी जिन्दगी में
मेरा छोटा सा हस्ताक्षर
मिट गया होगा
कदाचित अपनी श्याही में या फिर तनहाई में सिमट गया होगा
वेदना मुझको नहीं
संवेदना तुमको नहीं
फिर शोर कैसा है ?
शायद हमारे बीच जो बहती नदी थी
बाढ़ आयी है उसी में
और दूरी बढ़ गयी है बाढ़ में हमारे किनारों की

हमारी खामोशियों के बीच बहती हवाओं में कुछ पत्ते खड़खडाते हैं
वह अपनी वेदना कहते हैं
हमारी बात जैसी है
गुजर गए दिन की जैसी है
गुजरती रात जैसी है
तुम्हारी लम्बी सी जिन्दगी में
मेरा छोटा सा हस्ताक्षर
मिट गया होगा
कदाचित अपनी श्याही में या फिर तनहाई में सिमट गया होगा
क्या कहूँ ?
तेरी खामोशी भी मुझको खूबसूरत सी लगती है .
" ---- राजीव चतुर्वेदी

Friday, August 9, 2013

जिस दिन चार्ली चैपलिन को देख कर तुम हँसे थे


" जिस दिन चार्ली चैपलिन को देख कर तुम हँसे थे
मेरी नज़र से गिर गए थे
वह फुटपाथ पर लावारिश नवजात शिशु था
तुम उस पर हँसे थे
वह अनाथालय में पला बड़ा एक कमजोर कुपोषित बच्चा था
तुम उस पर हँसे थे
उसके पैरों में पोलियो हो गया था
तुम उसकी चाल देख कर हँसे थे 
तुमने कभी उसकी कविता पढी ?....पढ़ना
" One murder makes a villain
Hundred a hero
Numbers sanctify." --- Charlie Chaplin 
यानी  --" एक हत्या खलनायक बनाती है
और अनेक हत्याएं नायक
यह संख्या है जो आचरण को पवित्र करती है ."
यह  गंभीर बात है चार्ली चैपलिन की तरह
किन्तु तुम्हें सदैव उसमें एक जोकर दिखाई दिया
शायद तुम्हारा असली प्रतिविम्ब
जिसकी अब तक तुम शिनाख्त नहीं कर सके
कुछ लोग गंभीर चीजों को मजाक में लेते है
और मजाक को गंभीरता में
सच की शहादत में चार्ली चैपलिन मर चुका है
तुम्हारी आदत में ज़िंदा है
तभी तो तुम हँस रहे हो
क्योंकि दरअसल रोना चाहते हो .
" ---- राजीव चतुर्वेदी     

Wednesday, August 7, 2013

अन्न के उत्पादक से ज्यादा प्रतिष्ठित हैं असलहे के उत्पादक

"  जो लोग जिन्दगी के पूर्वार्ध में
अपने गाँव में
कट्टा बनाने का कुटीर उद्योग चलाते थे
खो गए कहीं
 जो लोग जिन्दगी के उत्तरार्ध में
मिसाइल बनाते हैं
याद किये जाते हैं
शोहरत बड़े गुनाह को पनाह देती है
अन्न के उत्पादक से ज्यादा प्रतिष्ठित हैं असलहे के उत्पादक
 और ऐसी दुनियाँ में
किसी किसान के यहाँ जन्म लेकर बड़ा होना
कोई आसान काम नहीं था
फिर भी मैं बड़ा हुआ
मैं जानता था
सृजन की क्षमता पर विध्वंश भारी है
हर भगवान् असलहाधारी है
मैं छोटा आदमी था
मैंने छोटे गुनाह किये
वह बड़ा आदमी था उसने बड़े गुनाह किये
आदतें नहीं बदली
आचरण नहीं बदले
पर व्याकरण हर बार बदले
किसी ने मुझे शिक्षा के असलहे से नौकरशाह बन कर लूटा
जो कानूनविद थे उन्होंने कानूनी असलहे से लूटा
डॉक्टर ने ज्ञान के असलहे से लूटा
वैज्ञानिक ने विज्ञान के असलहे से लूटा
व्यापारी ने तराजू से लूटा
मैं तो कट्टे वाला था
लुटे -पिटों से लूटता भी क्या ?           
शोहरत बड़े गुनाह को पनाह देती है
अन्न के उत्पादक से ज्यादा प्रतिष्ठित हैं असलहे के उत्पादक
 और ऐसी दुनियाँ में
किसी किसान के यहाँ जन्म लेकर बड़ा होना
कोई आसान काम नहीं था
फिर भी मैं बड़ा हुआ .
" ----- राजीव चतुर्वेदी

Sunday, August 4, 2013

इसके लिए जरूरी है कार से मरना

" सिद्धांतों वेदान्तों की बातें मुझको क्या मालुम ?
मैं राशन की कतार की आख़िरी इकाई हूँ
मुझे हर वह व्यक्ति अभिजात्य लगता है
जो हाजमोला खरीदता है
मैं जानता हूँ भूख
धरती के पेट की हो
या
मेरे पेट की
ज्वालामुखी की तरह फटती है
और हवा में दूर तलक उछल जाते हैं कुछ शोले और ढेरों पत्त्थर
जल्दी ही एक आवारा पत्थर
तुम्हारी और आयेगा
पर तुम्हारा कुछ नहीं बिगड़ेगा
बस
तुम्हारी कार का शीशा टूट जाएगा
तुम्हारा तो बीमा है
क्या भूख से मरने का भी कोई बीमा होता है ?
या
मेरे बच्चों को मेरे मरने के बाद ही कुछ मिल जाए
इसके लिए जरूरी है कार से मरना
कार से मरने वाले पर फर्क क्या पड़ता है
कि वह चलाते हुए मरा या चलते हुए ?
" ----- राजीव चतुर्वेदी     

Wednesday, July 31, 2013

छोटे लोगों की बड़ी महत्वाकांक्षाओं का परिणाम हैं छोटे राज्य



" छोटे लोगों की बड़ी महत्वाकांक्षाओं का परिणाम हैं छोटे राज्य . एक सरदार पटेल थे जिन्होंने लगभग आधा हजार छोटे राज्यों का विलय कर भारत संघ यानी Union of India बनाया ...वर्तमान भारत राष्ट्र के स्वरुप को साकार किया . फिर समय बीता ...देश में देश की व्यापकता के अनुपात में छोटे नेता आये जो राज्यों में आपने राजनीतिक कद के अनुसार समायोजित होते चले गए ...फिर उससे भी छोटे नेता आये ...वह बौने थे ...उनका कद छोटा था ...बड़े राज्य के फ्रेम में उनकी तश्वीर छोटी पड़ती थी सो उन्होंने अपना कद बढाने की कवायद करने से इसे बेहतर समझा कि राज्य को छोटा किया जाए ...तश्वीर बड़ी नहीं है तो फ्रेम को छोटा किया जाए ...और छोटे -छोटे राज्य बनने लगे ...क्या कोई सोरेन ,मुंडा , जोगी ,रमन सिंह,निशंक ,कोशियारी कभी किसी बड़े राज्य का मुख्यमंत्री बन सकता था ? --- नहीं ...कभी नहीं ....इनका कद इतना बड़ा नहीं था सो किसी प्रदेश से एक या दो मंडल काट कर एक छोटा राज्य बना कर वहाँ किसी छोटे नेता को मुख्यमंत्री बना दिया गया और छुटभैये नेता की ...बौने नेता की बड़ी महत्वाकांक्षा पूरी हुयी ...यह अलगावबाद कहाँ ले जा रहा है ? ...विखंडन की यह प्रक्रिया कहाँ रुकेगी ? आज छोटे प्रदेश मांगे जा रहे हैं कल छोटे देश की माँग होगी ? यह विखंडन की मानसिकता है ...राष्ट्र को खंडित करने की मानसिकता ...उत्तर प्रदेश से कट कर बने प्रदेश के नए नाम "उत्तरांचल" से विखंडन की मानसिकता के लोगों का अहंकार तुष्ट नहीं हुआ उन्हें तब संतोष हुआ जब इसका नाम पुनः परिवर्तित कर "उत्तराखण्ड" कर दिया गया . इसमें खण्डित करने की मंशा व्यक्त जो होती थी ...कल जम्मू से कश्मीर अलग करने की बात उठेगी तब उसे किस तर्क से रोकोगे ? बोडोलैंड की बात किस तर्क से रोकोगे ? फिर आबादी के अनुपात में बर्बादी करने की क्षमता की धौंस दे कर मुस्लिम बहुल इलाके अपने अलग -अलग राज्य मांगेंगे तब किस तर्क से रोकोगे ? ...यह आसान किश्तों में राष्ट्र तोड़ा जा रहा है ...सरदार पटेल का भारत संघ का सपना तोड़ा जा रहा है ...आप विराट राष्ट्र के अथक प्रयास के साथ हैं या प्रथक प्रयासों के साथ है ? सावधान, देश के जो लोग साथ नहीं चल सकते वह प्रथक हो कर प्रथकतावादी आन्दोलन चलाते है ...यह बौने लोगों की बड़ी महत्वाकान्क्षाओं का प्रतिफल है ...आज बड़े प्रदेश से पृथक होंगे ...कल बड़े देश से पृथक होंगे ...हमें पृथक नहीं अथक लोगों की जरूरत है ...राष्ट्र स्थापित होने की प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही टूट रहा है ...आसान किश्तों में ...नागरिकता के रिश्तों में ." ------ राजीव चतुर्वेदी