This is the assertion of anyone's right to be heard...
Friday, February 24, 2012
"खंडहर के खंडित स्वरों को अबाबीलों ने आवाज़ दी,
याद क्यों बहती है नदी में दिल में क्यों रहती नहीं ." --राजीव चतुर्वेदी.
"समय की आँधियों से जो सहमा था कलेंडर था, वह तो सूरज है समय मोहताज है उसके ही उजालों को. समन्दर तक जो जाते हैं वो नक्श -ए -पा भी मेरे हैं, शिखर पर छोड़ आया हूँ मैं अपने ही निशानों को ."---- राजीव चतुर्वेदी
1 comment:
yaadon ko bahnaa hi hogaa
rukne se dard ka majmaa hai.....
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