Sunday, December 22, 2013

मैं हवा हूँ मेरे मित्र ,मेरे साथ चाहो तो बहो वरना घरों में चुपचाप रहो

" मैं हवा हूँ मेरे मित्र
मेरे साथ चाहो तो बहो
वरना घरों में चुपचाप रहो
तुम पर दर ...उस पर बाजे से बजते दरवाजे हैं
हर मौसम में खीसें निपोरती खिड़कियाँ हैं
मौसम को कमरे में बंद करने का दंभ है
सांसारिक सम्बन्ध है ...काम का अनुबंध है ...सुविधाओं का प्रबंध है
संवेदनाओं का पाखंडी निबंध है
जिसमें शब्दों की बाढ़ किनारे छू कर लौट आती है हर बार
मैं हवा हूँ मेरे मित्र
मेरे पास अपना कुछ भी नहीं
न दर है न दरवाजा न खिड़की न रोशनदान कोई
कोई बंधन भी नहीं
बहते लोगों के सम्बन्ध नहीं होती
स्वतंत्र लोगों के अनुबंध नहीं होते
निश्छल लोगों के प्रबंध नहीं होते
निर्बाध वेग का निबंध कैसा ?
मैं हवा हूँ मेरे मित्र
मेरे साथ चाहो तो बहो
वरना बाहर के कोलाहल से
अपने अन्दर के सन्नाटे का द्वंद्व सहो
और कुछ न कहो

देखना एक दिन मैं अपने प्रवाह में लीन हो जाऊंगा
और तुम अपने ही अथाह में विलीन हो जाओगे
तब यह दर ...यह दरवाजे ...यह खिड़कियाँ
तुम्हें हर पूछने वाले से कह देंगे
बहुत कुछ सह गया है वह
हवा में बह गया है वह
चुपके से ." ----- राजीव चतुर्वेदी

Thursday, December 19, 2013

कविता के लिए जरूरी है जिन्दगी के पार निकल जाना

"कविता के लिए जरूरी है जिन्दगी के पार निकल जाना
और अन्हादों को गुनगुनाना
मरा हुआ व्यक्ति कविता नहीं समझता
मरे हुए शब्द कविता नहीं बनते
ज़िंदा आदमी कविता समझ सकता ही नहीं
ज़िंदा शब्द कविता बन नहीं सकते
कविता के लिए जरूरी है जिन्दगी के पार निकल जाना
और अन्हादों को गुनगुनाना
इस लिए भाप में नमीं को नाप
अनहद की सरहद मत देख हर हद की सतह को नाप
कविता संक्रमण नहीं विकिरण है
आचरण का व्याकरण मत देख
शब्देतर संवाद सदी के शिलालेख हैं
उससे तेरी आश ओस की बूंदों जैसी झिलमिल करती झाँक रही है
जैसे उडती हुयी पतंगें हवा का रुख भांप रही हैं
नागफनी के फूल निराशा की सूली पर
और रक्तरंजित सा सूरज डूब रहा है आज हमारे मन में देखो
उसके पार शब्द बिखरे हैं लाबारिस से
उन शब्दों पर अपने दिल का लहू गिराओ
कुछ आंसू मुस्कान मुहब्बत मोह स्नेह श्रृगार मिलाओ
शेष बचे सपने सुलगाओ उनमें कुछ अंगार मिलाओ
अकस्मात ही अक्श उभर आये जैसा भी
गौर से देखो उसमें कविता की लिपि होगी 
कविता के लिए जरूरी है जिन्दगी के पार निकल जाना
और अन्हादों को गुनगुनाना ." ----- राजीव चतुर्वेदी

Saturday, December 14, 2013

मैंने इश्क की इबादत कब की ?

"मैंने इश्क की इबादत कब की ?
ये रवायत थी कवायद कब की ?
मैंने तो सोचा था इश्क से महकेगी फिज़ा
मैंने सोचा था कुछ फूल यहाँ महकेंगे
मैंने तो सोचा था कुछ जज़वात यहाँ चहकेंगे
मैंने सोचा था चांदनी ओढ़े हुए कुछ ख्वाब खला में होंगे
मैंने सोचा था इकरा तेरे रुखसार का उनवान होगी
मैंने सोचा था तेरे बदन की खुशबू मेरी मेहमां होगी
मैंने चन्दा को समेटा था तेरे माथे पे बिंदी की जगह
तू इबादत थी या आदत मेरी,-- सहमी हुयी शहनाई से भी पूछ ज़रा
तू शराफत थी या शरारत मेरी,-- तन्हाई से भी पूछ ज़रा
मैंने इश्क की इबादत कब की ?
यह महज शब्द है अल्फाजों में सिमटा सा हुआ
अब इसे अहसास उढा कर मैं सो जाऊंगा." ----राजीव चतुर्वेदी

Thursday, December 5, 2013

सुनो... तुम पूछती हो न कि तुमसे कितना प्यार करता हूँ मै....??


"सुनो...
तुम पूछती हो न कि
तुमसे कितना प्यार करता हूँ मै....??

यह तुमने क्या किया ?
मैं कहना तो चाहता था "असीम "
पर रिश्तों की दीवारें लाँघ कर आतीं
हर रिश्ता एक सीमा है
एक प्रकार है
एक संस्कार है 

एक प्राचीर है जिसकी अपनी ही दीवार है
एक अवधि है
एक परिधि है
यह तुमने क्या किया ?
एक रिश्ते के नाम में एक अहसास को सीमित किया
मैं तुमसे असीम प्यार करना चाहता था
पर यह तुमने क्या किया ?
हमारे अस्तित्व के बीच बहती हवाओं से एक अनवरत अहसास को
एक रिश्ते का नाम दिया --- यह तुमने क्या किया ?
तुम बेटी हो सकती हो
बहन हो सकती हो
पत्नी हो सकती हो
प्रेमिका हो सकती हो
तुम कुछ भी हो सकती हो पर सीमाओं में
इसी लिए मैं तुमसे सीमित प्यार करता हूँ
असीम नहीं

सुनो...
तुम पूछती हो न कि
तुमसे कितना प्यार करता हूँ मै....??

यह तुमने क्या किया ?
मैं कहना तो चाहता था "असीम "
पर रिश्तों की दीवारें लाँघ कर आतीं
। " ---- राजीव चतुर्वेदी

तुम कभी भी वह नहीं थे जो मैंने तुम्हें समझा

"तुम कभी भी वह नहीं थे जो मैंने तुम्हें समझा
फिर भी यह मरीचिका और मृगतृष्णा का रिश्ता था और रास्ता भी एक
परिभाषा और अभिलाषा के बीच प्रतीत की पगडण्डी का परिदृश्य प्रश्न है
तो उत्तर कैसा ?
जो लोग सूरज की रोशनी में रास्ता नहीं देखते

वह पूछते हैं ध्रुवतारे से सप्तर्षि की पहेली
सभ्यता की हर शुरूआत में प्रश्न प्रतीकों में अंगड़ाई लेता है
हर सुबह के गुनगुनाते सूरज का गुनाह है यह
तुमने कुछ कहा ही नहीं और मैंने सुन लिया
सत्य के संकेत उगते हैं निगाहों में।
" ----- राजीव चतुर्वेदी

Wednesday, October 16, 2013

अल्लाह की आँख में धूल मत झोंक लल्ला !! ईद -उल-जुहा मुबारक !!

" ल्लाह की आँख में धूल मत झोंक लल्ला .कुर्बानी का मतलब है किसी अपने अजीज की कुर्बानी . यह क्या हुआ कि शाम को बकरी खरीदी और सुबह काट डाली और चिल्लाने लगे कुर्बानी ...कुर्बानी ... दरअसल कुर्बानी तो बकरी देती है ...अपनी जान की कुर्बानी और आप उसका गोस्त खा कर जश्न मना कर चिल्लाते हो कुर्बानी ...आपने कौन सी कुर्बानी दी है ? ...यह बकरी की कुर्बानी नहीं उस मासूम शान्तिप्रिय शाकाहारी विवश जानवर के साथ विश्वासघात है ...और अगर इसे कुर्बानी कहते हैं ...और अगर इस कुर्बानी से सबब मिलता है ...अल्लाह खुश होता है ...तो इज़राइल और अमेरिका तो तुम्हारी चुन -चुन कर कुर्बानी देते हैं ....जैसे तुम मासूम अहिंसक बकरी /ऊँट /भेड़ का क़त्ल करते हो और कहते हो कुर्बानी वैसी तो कुर्बानी इज़राइल और अमेरिका अक्सर करते हैं ...उनको भी इस कथित कुर्बानी का सबब मिलता होगा तभी तो यह देश फल-फूल रहे हैं, सरसब्ज हैं, खुशहाल हैं, बरक्कत कर रहे हैं . खुदा की आँख में धूल झोंकने वालो खुद से पूछो किस अज़ीज की कुर्बानी दी है ...दीन के लिए क्या कुर्बानी दी है ?...ईमान के लिए क्या कुर्बानी दी है ? 

"झूठ झटके का था इसलिए नहीं खाया उसने,
सच को उसने सचमुच हलाल कर डाला ."
!! ईद -उल-जुहा मुबारक !! " ----- राजीव चतुर्वेदी


Saturday, September 28, 2013

आओ कुछ ख्वाब खरीदें उसी मण्डी से

" आओ कुछ ख्वाब खरीदें उसी मण्डी से
जहाँ हम बिक रहे हैं रोज टुकड़ों में
कहो, कैसा लगा यह सत्य सुन कर ?
शाम का सूरज अस्त होता है पराजित सा
रात को जब चांदनी चर्चा करेगी
तो उसमें तुम्हारी वेदना भी गुमशुदा होगी
ये रंगीन रातें उनकी हैं और ग़मगीन सुबह तुम्हारी है
सुना है ये धरती घूमती है
तो धरती के सभी सिद्धांत भी तो घूमते होंगे
इस घूमते भूगोल के अक्षांश से पूछो
हमारी वेदना की व्याख्या
जिन्दगी की भूमध्य रेखा से और कितनी दूर तक फ़ैली हुयी है 
और हर देशांतर का टापू एक मण्डी सा सजा है
देह से ले कर वहाँ पर स्नेह बिकता है --- खरीदोगे ?
चले आओ
आओ कुछ ख्वाब खरीदें उसी मण्डी से
जहाँ हम बिक रहे हैं रोज टुकड़ों में
कहो, कैसा लगा यह सत्य सुन कर ?"
  ---- राजीव चतुर्वेदी

Thursday, September 5, 2013

उस मोहल्ले के कुत्ते शान्ति पर बहुत भोंकते हैं

" उस मोहल्ले के कुत्ते शान्ति पर बहुत भोंकते हैं
आज कुछ कुत्तों ने शान्ति को काट लिया
मुकदमा चला
शान्ति से कुत्तों के वकीलों ने लम्बी जिरह की
यह कि कुत्तों का भोंकना तो उनका अभिव्यक्ति का अधिकार है 
और कुत्तों की मजहबी आस्था को ठेस पहुंचाने पर वह काट भी सकते हैं
संवैधानिक सा असंवैधानिक सवाल यह भी था
कि शान्ति किसने पहले भंग की ?
 काटने वालों ने या काटे जाने पर चीखने वालों ने ?"
---- राजीव चतुर्वेदी

Wednesday, August 14, 2013

खाद्य सुरक्षा बिल-- देश की भूख में वोट नहीं तलाशिये


"Food Security Bill यानी खाद्य सुरक्षा बिल ...अच्छा झुनझुना है ...पेप्सी की तरह देश को पिलाया जा रहा है जिससे पोषण कुछ भी नहीं डकार जोरदार आ रही है ...वह यही चाहते हैं ...वह चाहते हैं आप भूखे न मरें क्योंकि भूखा मरता आदमी विद्रोह कर देता है ...वह यह भी नहीं चाहते कि आप भरे पेट हों क्योंकि भरे पेट आदमी अपने अधिकार, नीति, सिद्धांत, राष्ट्रवाद की बात करता है ...वह चाहते हैं कि आप भूख से पूरी तरह नहीं मरें थोड़े से ज़िंदा भी रहें ताकि उन्हें वोट दे सकें ...वह चाहते हैं आप अधमरे रहें ...अधमरा कुपोषित नागरिक राशन की दुकान या वोटर की कतार में कातर सा खड़ा पाया जाता है आन्दोलन नहीं करता . उसे अखबार की ख़बरें नहीं अखरतीं ...उसे दूरदर्शन पर राष्ट्रीय दर्द नहीं देखना ...वह जब कभी दूरदर्शन देखने का जुगाड़ कर पाता है तो अपनी जिन्दगी में कुछ समय को ही सही कुछ सुखद कल्पनाएँ आयात कर लेता है ...उसे रूपये का अवमूल्यन, पेट्रोल की कीमत , टेक्स की दरें, शिक्षा का मंहगा होना, फ्लेट का मंहगा होना, घोटाले या रोबर्ट्स बढेरा जैसों का समृद्धि का समाज शास्त्र प्रभावित नहीं करता ...वह यही चाहते है इसीलिए वह चाहते हैं भूखे पेट कुपोषित अधमरा आदमी जो महज वोटर हो नागरिक नहीं . अगर खाद्य सुरक्षा ही देनी है तो नौ साल गुजर गए इस गए गुजरे मनमोहन की सरकार को क्या कृषि को लाभकारी बनाने की कोई योजना आयी ? खेतों में अन्न की जगह अब प्लौट उग रहे हैं इस विनाश को नगर विकास बताते तुगलको जब आबादी बढ़ेगी और खेत कम हो जायेगे तो कैसे पेट भरेगा ...तब कृषि उत्पाद महगे तो होंगे पर किसान के यहाँ नहीं आढ़ततिये के गोदाम पर और मालदार आदमी वह खरीद लेगा गरीब फिर भूखा मरेगा ...जैसे गाय /भैंस का दूध उसके बच्चे से ज्यादा हमारे बच्चे पीते हैं ...गाँव के बच्चों से ज्यादा शहर के बच्चे घी /मख्खन खाते है ...वह यही चाहते हैं . --- देश की भूख में वोट नहीं तलाशिये कृषि को लाभकारी बनाइये ...यह आपके राहुल, आपकी प्रियंकाएं या प्रियंकाओं के रोबर्ट्स केवल अपना पेट भरते हैं ...देश का पेट तो किसान भरता है ---उसके लिए क्या किया ?" ---- राजीव चतुर्वेदी


Monday, August 12, 2013

तुम्हारी लम्बी सी जिन्दगी में

"तुम्हारी लम्बी सी जिन्दगी में
मेरा छोटा सा हस्ताक्षर
मिट गया होगा
कदाचित अपनी श्याही में या फिर तनहाई में सिमट गया होगा
वेदना मुझको नहीं
संवेदना तुमको नहीं
फिर शोर कैसा है ?
शायद हमारे बीच जो बहती नदी थी
बाढ़ आयी है उसी में
और दूरी बढ़ गयी है बाढ़ में हमारे किनारों की

हमारी खामोशियों के बीच बहती हवाओं में कुछ पत्ते खड़खडाते हैं
वह अपनी वेदना कहते हैं
हमारी बात जैसी है
गुजर गए दिन की जैसी है
गुजरती रात जैसी है
तुम्हारी लम्बी सी जिन्दगी में
मेरा छोटा सा हस्ताक्षर
मिट गया होगा
कदाचित अपनी श्याही में या फिर तनहाई में सिमट गया होगा
क्या कहूँ ?
तेरी खामोशी भी मुझको खूबसूरत सी लगती है .
" ---- राजीव चतुर्वेदी

Friday, August 9, 2013

जिस दिन चार्ली चैपलिन को देख कर तुम हँसे थे


" जिस दिन चार्ली चैपलिन को देख कर तुम हँसे थे
मेरी नज़र से गिर गए थे
वह फुटपाथ पर लावारिश नवजात शिशु था
तुम उस पर हँसे थे
वह अनाथालय में पला बड़ा एक कमजोर कुपोषित बच्चा था
तुम उस पर हँसे थे
उसके पैरों में पोलियो हो गया था
तुम उसकी चाल देख कर हँसे थे 
तुमने कभी उसकी कविता पढी ?....पढ़ना
" One murder makes a villain
Hundred a hero
Numbers sanctify." --- Charlie Chaplin 
यानी  --" एक हत्या खलनायक बनाती है
और अनेक हत्याएं नायक
यह संख्या है जो आचरण को पवित्र करती है ."
यह  गंभीर बात है चार्ली चैपलिन की तरह
किन्तु तुम्हें सदैव उसमें एक जोकर दिखाई दिया
शायद तुम्हारा असली प्रतिविम्ब
जिसकी अब तक तुम शिनाख्त नहीं कर सके
कुछ लोग गंभीर चीजों को मजाक में लेते है
और मजाक को गंभीरता में
सच की शहादत में चार्ली चैपलिन मर चुका है
तुम्हारी आदत में ज़िंदा है
तभी तो तुम हँस रहे हो
क्योंकि दरअसल रोना चाहते हो .
" ---- राजीव चतुर्वेदी     

Wednesday, August 7, 2013

अन्न के उत्पादक से ज्यादा प्रतिष्ठित हैं असलहे के उत्पादक

"  जो लोग जिन्दगी के पूर्वार्ध में
अपने गाँव में
कट्टा बनाने का कुटीर उद्योग चलाते थे
खो गए कहीं
 जो लोग जिन्दगी के उत्तरार्ध में
मिसाइल बनाते हैं
याद किये जाते हैं
शोहरत बड़े गुनाह को पनाह देती है
अन्न के उत्पादक से ज्यादा प्रतिष्ठित हैं असलहे के उत्पादक
 और ऐसी दुनियाँ में
किसी किसान के यहाँ जन्म लेकर बड़ा होना
कोई आसान काम नहीं था
फिर भी मैं बड़ा हुआ
मैं जानता था
सृजन की क्षमता पर विध्वंश भारी है
हर भगवान् असलहाधारी है
मैं छोटा आदमी था
मैंने छोटे गुनाह किये
वह बड़ा आदमी था उसने बड़े गुनाह किये
आदतें नहीं बदली
आचरण नहीं बदले
पर व्याकरण हर बार बदले
किसी ने मुझे शिक्षा के असलहे से नौकरशाह बन कर लूटा
जो कानूनविद थे उन्होंने कानूनी असलहे से लूटा
डॉक्टर ने ज्ञान के असलहे से लूटा
वैज्ञानिक ने विज्ञान के असलहे से लूटा
व्यापारी ने तराजू से लूटा
मैं तो कट्टे वाला था
लुटे -पिटों से लूटता भी क्या ?           
शोहरत बड़े गुनाह को पनाह देती है
अन्न के उत्पादक से ज्यादा प्रतिष्ठित हैं असलहे के उत्पादक
 और ऐसी दुनियाँ में
किसी किसान के यहाँ जन्म लेकर बड़ा होना
कोई आसान काम नहीं था
फिर भी मैं बड़ा हुआ .
" ----- राजीव चतुर्वेदी

Sunday, August 4, 2013

इसके लिए जरूरी है कार से मरना

" सिद्धांतों वेदान्तों की बातें मुझको क्या मालुम ?
मैं राशन की कतार की आख़िरी इकाई हूँ
मुझे हर वह व्यक्ति अभिजात्य लगता है
जो हाजमोला खरीदता है
मैं जानता हूँ भूख
धरती के पेट की हो
या
मेरे पेट की
ज्वालामुखी की तरह फटती है
और हवा में दूर तलक उछल जाते हैं कुछ शोले और ढेरों पत्त्थर
जल्दी ही एक आवारा पत्थर
तुम्हारी और आयेगा
पर तुम्हारा कुछ नहीं बिगड़ेगा
बस
तुम्हारी कार का शीशा टूट जाएगा
तुम्हारा तो बीमा है
क्या भूख से मरने का भी कोई बीमा होता है ?
या
मेरे बच्चों को मेरे मरने के बाद ही कुछ मिल जाए
इसके लिए जरूरी है कार से मरना
कार से मरने वाले पर फर्क क्या पड़ता है
कि वह चलाते हुए मरा या चलते हुए ?
" ----- राजीव चतुर्वेदी     

Wednesday, July 31, 2013

छोटे लोगों की बड़ी महत्वाकांक्षाओं का परिणाम हैं छोटे राज्य



" छोटे लोगों की बड़ी महत्वाकांक्षाओं का परिणाम हैं छोटे राज्य . एक सरदार पटेल थे जिन्होंने लगभग आधा हजार छोटे राज्यों का विलय कर भारत संघ यानी Union of India बनाया ...वर्तमान भारत राष्ट्र के स्वरुप को साकार किया . फिर समय बीता ...देश में देश की व्यापकता के अनुपात में छोटे नेता आये जो राज्यों में आपने राजनीतिक कद के अनुसार समायोजित होते चले गए ...फिर उससे भी छोटे नेता आये ...वह बौने थे ...उनका कद छोटा था ...बड़े राज्य के फ्रेम में उनकी तश्वीर छोटी पड़ती थी सो उन्होंने अपना कद बढाने की कवायद करने से इसे बेहतर समझा कि राज्य को छोटा किया जाए ...तश्वीर बड़ी नहीं है तो फ्रेम को छोटा किया जाए ...और छोटे -छोटे राज्य बनने लगे ...क्या कोई सोरेन ,मुंडा , जोगी ,रमन सिंह,निशंक ,कोशियारी कभी किसी बड़े राज्य का मुख्यमंत्री बन सकता था ? --- नहीं ...कभी नहीं ....इनका कद इतना बड़ा नहीं था सो किसी प्रदेश से एक या दो मंडल काट कर एक छोटा राज्य बना कर वहाँ किसी छोटे नेता को मुख्यमंत्री बना दिया गया और छुटभैये नेता की ...बौने नेता की बड़ी महत्वाकांक्षा पूरी हुयी ...यह अलगावबाद कहाँ ले जा रहा है ? ...विखंडन की यह प्रक्रिया कहाँ रुकेगी ? आज छोटे प्रदेश मांगे जा रहे हैं कल छोटे देश की माँग होगी ? यह विखंडन की मानसिकता है ...राष्ट्र को खंडित करने की मानसिकता ...उत्तर प्रदेश से कट कर बने प्रदेश के नए नाम "उत्तरांचल" से विखंडन की मानसिकता के लोगों का अहंकार तुष्ट नहीं हुआ उन्हें तब संतोष हुआ जब इसका नाम पुनः परिवर्तित कर "उत्तराखण्ड" कर दिया गया . इसमें खण्डित करने की मंशा व्यक्त जो होती थी ...कल जम्मू से कश्मीर अलग करने की बात उठेगी तब उसे किस तर्क से रोकोगे ? बोडोलैंड की बात किस तर्क से रोकोगे ? फिर आबादी के अनुपात में बर्बादी करने की क्षमता की धौंस दे कर मुस्लिम बहुल इलाके अपने अलग -अलग राज्य मांगेंगे तब किस तर्क से रोकोगे ? ...यह आसान किश्तों में राष्ट्र तोड़ा जा रहा है ...सरदार पटेल का भारत संघ का सपना तोड़ा जा रहा है ...आप विराट राष्ट्र के अथक प्रयास के साथ हैं या प्रथक प्रयासों के साथ है ? सावधान, देश के जो लोग साथ नहीं चल सकते वह प्रथक हो कर प्रथकतावादी आन्दोलन चलाते है ...यह बौने लोगों की बड़ी महत्वाकान्क्षाओं का प्रतिफल है ...आज बड़े प्रदेश से पृथक होंगे ...कल बड़े देश से पृथक होंगे ...हमें पृथक नहीं अथक लोगों की जरूरत है ...राष्ट्र स्थापित होने की प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही टूट रहा है ...आसान किश्तों में ...नागरिकता के रिश्तों में ." ------ राजीव चतुर्वेदी


Sunday, July 28, 2013

जिन्दगी पैर नहीं तो पहियों पर भी चल ही लेती है




" जिन्दगी पैर नहीं तो पहियों पर भी चल ही लेती है ,
खुदा खुदगर्ज था हम जिन्दगी को तनहा तलाशने निकले .
"

--- राजीव चतुर्वेदी

Saturday, July 27, 2013

तवायफ के होंठ पर तबस्सुम तलाशते लोगों

"तवायफ के होंठ पर तबस्सुम तलाशते लोगों,
धूप बादल से गुजर कर धरतियों पर आ गई.
चांदनी के चरित्रों पर अब दोपहर की सनद चस्पा है,
शाम को सहमा हुआ सा उजाला रात से राहत की उम्मीद क्यों करता है ?
सहमे हुए से शहर में सोचती है सभ्यता,
वक्त की यह वेदना
आँखों से टपक कर गाल पर क्यों आ गयी ?"
----राजीव चतुर्वेदी

Monday, July 8, 2013

खुदा खुद से ही खौफजदा था यारो

" तू कभी खुद आ मेरे पास तो तुझे खुदा कहूं ,
वरना खामखयाली में रखा क्या है ?
" ----राजीव चतुर्वेदी
==================
"अजीब सी रवायत है जरायम की दुनियाँ में ,
लोग सीरत नहीं सूरत छिपाए फिरते हैं
." ----राजीव चतुर्वेदी 
===================
"  खुदा खुद से ही खौफजदा था यारो ,
उसने ताउम्र अपनी सूरत छिपा कर रखी
." ----राजीव चतुर्वेदी
======================
"वह मजहब गिरोह जैसा  है ज़रा गौर करें ,
सरगना रूह्पोश और बन्दे नकाबपोश दहशतगर्द हैं काफी
." --- राजीव चतुर्वेदी 

     

Sunday, July 7, 2013

निर्जन में जब सृजन ज़रा सा विचलित होगा ...मेरे टुकड़े खनक उठेंगे

" इसके पहले कि मैं बटोर पाता अपने को
वह मेरे कुछ टुकड़े उठा कर चल दिया
मैंने अपने बिखराव को जोड़ा बहुत
पर मुकम्मल होता तो होता कैसे ?
दुखड़े मेरे पास पड़े थे
टुकड़े उसके पास पड़े थे
वह थोड़ा मेरे पास पड़ा था
मैं भी उसके पास पड़ा था थोड़ा सा
खंडित व्यक्तित्वों के दम्भ पहाड़ों पर पत्थर से लुडक रहे हैं
सिद्धों के सिद्धांत देख कर गिद्धों से तितली ने पूछा
मुझको फूल जहाँ पर दिखते तुमको लाशें क्यों दिखती हैं ?
दृष्टिकोण का क्षितिज जहाँ हो
आसमान धरती पर आ कर टिक जाता है
और वहाँ तक मैं बिखरा हूँ
देवदार का प्रश्न यही है दावानल से
मेरे टुकड़े मत लौटाओ
ब्रम्हलीन होने का मतलब जान चुका हूँ
दूर क्षितिज पर लक्ष समझता था मैं जिसको
आज वहाँ पर यक्ष खड़ा है
और मरीचिका टुकड़े मेरे कैनवास पर सजा रही है
निर्जन में जब सृजन ज़रा सा विचलित होगा
मेरे टुकड़े खनक उठेंगे .
" ----- राजीव चतुर्वेदी

Thursday, July 4, 2013

बड़ा हमलावर दौर है यह

" बड़ा हमलावर दौर है यह
जब कातिलों को मसीहा बताने की मुहिम में
क़त्ल कर दिए गए लोगों के परिजन भी शामिल है
एक मजहब में ऐसा खुदा भी है
जो एक मासूम से जिनह करता है
भगवानो देवताओं की लम्बी लाइन नाजायज पिताओं की भी है
किन्तु कोई कर्ण उनसे नहीं लड़ता
लेकिन परिक्रमा के विरुद्ध पराक्रम का पक्षधर कार्तिकेय खडा हो जाता है
एक राजा के अश्वमेध यज्ञ के बिगडैल घोड़े को उसके ही बेटे मर्यादा में बांधते हैं
बताओ लव-कुश, कार्तिकेय, सरस्वती के कहाँ कितने मंदिर हैं ?
सभी भगवानो के हाथ में असलहे हैं
और नकाबपोश आतंकियों का ऐसा खुदा है जो रूह्पोश है
बड़ा हमलावर दौर है यह
जब कातिलों को मसीहा बताने की मुहिम में
क़त्ल कर दिए गए लोगों के परिजन भी शामिल है .
" -----राजीव चतुर्वेदी

Tuesday, July 2, 2013

महिला आरक्षण--"देश राजनीति" से नहीं "देह राजनीति" से एन्ट्री


"महिलाओं को राजनीति में आरक्षण चाहिए .-- क्यों ? कैसा ? आखिर यह करना क्या चाहती हैं ? देश के लिए कुछ करने के लिए आरक्षण की जरूरत नहीं जहाँ जिसे आरक्षण चाहिए उसे राष्ट्र भक्षण के लिए आरक्षण चाहिए राष्ट्र संरक्षण के लिए आरक्षण कोई नहीं माँगता . कितनी महिलायें हैं जो देश राजनीति के कारण आज राजनीतिक पटल पर पर हैं और कितनी देह राजनीति के कारण राजनीतिक मलाई चाट रही हैं ?---सभी जानते हैं . यह पश्चिमी देशों का फैलाया मिथक है कि एशिया और मुख्यतः भारतीय उपमहाद्वीप में महिलाओं की दुर्दशा है जबकि सच यह है कि दुनियाँ की सर्वाधिक महिला नेता एशिया में ही हुईं हैं इजराइल की गोल्डा मायर, श्रीलंका की भंडारानायिके, म्यांमार की आन सां सूकी, मलेशिया की मेघावती सुकार्णोपुत्री , बंगलादेश की खालिदा जिया और शेख हसीना, पाकिस्तान की बेनजीर भुट्टो, भारत की इंदिरा गाँधी विश्व राजनीति की महत्वपूर्ण नेता रही हैं . इसके समान्तर सच यह भी है कि विश्व में सर्वाधिक वैश्याएँ भी एशिया और उसके भी भारतीय उपमहाद्वीप से हैं . भारतीय वर्तमान संसद को देखें -- लोकसभा अध्यक्ष महिला, नेता विपक्ष महिला और सरकार भी महिला की . कुछ समय पहले राष्ट्रपति भी महिला थीं . और इस नेतृत्व के बाद महिला की दशा दिशा यह कि विश्व में बालवैश्याओं में हर सातवीं बाल वैश्या भारत की बेटी है . वर्तमान  भारत में जहाँ-जहाँ महिला मुख्यमंत्री हैं वहाँ -वहाँ विश्व के सबसे बड़े वैश्यालय हैं . ममता बनर्जी का कोलकाता, शीला दीक्षित की दिल्ली और जयललिता की चेन्नई इसके प्रमाण हैं कि राजनीतिक नेतृत्व से महिला की दुर्दशा नहीं सुधरने वाली ... धर्मेन्द्र के साथ "पानी में जले मोरा गोरा बदन ...पानी में", गाते गाते कब और क्या गुल खिला कर जय ललिता आज पानी से भरे समुद्र तटीय प्रांत की महान नेता हैं यह सर्वविदित है .सतीप्रथा के संस्कारों के सतत विरोध की सनद जयप्रदा की दैहिक दैविक भौतिक जरूरतें पूरी करते करते अमर सिंह पस्त हो चुके हैं . सोनियाँएँ , मेनकाएँ , अम्बिकाएं और अन्य तमाम अपने दौर की विष कन्याएं "देश राजनीति" से नहीं "देह राजनीति" से एन्ट्री कर हमारी राजनीति के स्खलित चरित्र का चिन्ताजनक कारण बनी ही चुकी हैं . चंडीगढ़ की हिना फ़ना हो चुकीं है .किसी सोनिया को क्या पता खुले में शौच जाने को अभिशिप्त महिला की ग़मगीन गरिमा का सच ...उसे संसद नहीं शौचालय चाहिए . आज देश का लेटेस्ट फैशन जानना हो तो किसी भी राजनीतिक दल के कार्यालय चले जाईये वहाँ कुछ क्या, बहुत कुछ कर गुजरने का जज्वा लिए विभिन्न आकार प्रकार की कई नगर बधू और पिनकोड बधू तक मिल जाएँगी जिनकी छठा बता रही होगी कई वह देश के लिए बहुत कुछ ही नहीं सब कुछ करने पर आमादा है बशर्ते ... आरक्षण समाज सेवा की लगन के आधार पर नहीं लिंग के आधार पर चाहिए ...लिंग के आधार पर अनुकम्पा पुरुष को कापुरुष या शिखन्डी बनने, महिला को वैश्या बनने और हिजड़े को नेग मिलने की हद तक अपमान के पंकिलतल तक डुबो देता है ...फिर भी अगर लिंग आधारित आरक्षण की दरकार है तो पुरुषों को 33 % , महिलाओं को 33 %, हिजड़ों को 33 % और शेष बचे 01 % में बौबी डार्लिंग, रेणुका चौधरी, राखी सावंत सरीखी लिंगेतर प्रतिभाओं को समायोजित कर देना चाहिए ." ----- राजीव चतुर्वेदी






Wednesday, June 26, 2013

...दृष्टांत यदि दुष्ट के कान में चला जाए तो दुष्टान्त हो जाता है



" ज्ञान की वैदिक धारा के प्रारम्भिक दौर में समझदार लोगों ने आगाह किया था कि ज्ञान "कुपात्र" को नहीं देना चाहिए किन्तु ज्ञान की गंगा में नाले गटर गिरते गए और प्रदूषण होता गया . उदाहरण देखिये तुलसी रामायण की कुपड्डढी व्याख्या से कैसे अर्थ का अनर्थ हो गया --
"ढोल गंवार शूद्र पशु नारी,

सकल ताड़ना के अधिकारी ."

( सकल = Gross , ताड़ना =Assessment )
"Drum Rustic Down Trodden Women ---They all deserve gross assessment ."
तुलसी दास जी संस्कृति के महान विद्वान् थे . उन्होंने उर्दू का कोई शब्द उपयोग में नहीं लाया तब "सकल यानी शक्ल " को क्यों उपयोग में लाते ? संस्कृति के महान विद्वान् को विकृत के दुर्दांत शैतानो ने किस तरीके से समझा डाला कि अर्थ का अनर्थ हो गया . समझाया गया कि तुलसी दास जी ने कहा है --- ."ढोल गंवार शूद्र पशु नारी, सकल ताड़ना यानी शक्ल देखते ही प्रताड़ित किये जाने के अधिकारी हैं ." जब कि तुलसी दास जी इनकी सकल ताड़ना यानी कुल भावनात्मक मूल्यांकन /समीक्षा यानी gross assessment की बात कर रहे हैं . ज्ञान कुपात्र के कान में जाता है तो जुबान से विष वमन और दिमाग से वैचारिक गबन होता है ...दृष्टांत यदि दुष्ट के कान में चला जाए तो दुष्टान्त हो जाता है ." -----राजीव चतुर्वेदी

Tuesday, June 25, 2013

मैं जी कर भी तुम्हारा था, ... मैं मर कर भी तुम्हारा हूँ

" ज़िंदा विश्वासों में लाशों सा अहसास ,
संवेदना के शब्द बोझिल हैं बहुत ,-- ढोए नहीं जाते
मैं थक कर सो गया था
मेरे कैदी से कोलाहल को शान्ति की चादर उढाओ 
कफ़न जो कह रहे हैं लोग
उनको नादान समझ कर माफ़ कर देना
यह सफ़र पूरा हुआ ...
जब हवा का कोई झोंका तुम्हें स्पर्श करके गुजर जाए
मेरी याद को तुम याद कर लेना
तुम जहाँ  थे मैं वहाँ पहले भी नहीं था
एक आकार का अहसास था
और अब
एक अहसास का आकार हूँ
मैं जैसा हूँ स्वीकार कर लो
मैं जी कर भी तुम्हारा था
मैं मर कर भी तुम्हारा हूँ .
" ----राजीव चतुर्वेदी  

मैं जी कर भी तुम्हारा था, ... मैं मर कर भी तुम्हारा हूँ

" ज़िंदा विश्वासों में लाशों सा अहसास ,
संवेदना के शब्द बोझिल हैं बहुत ,-- ढोए नहीं जाते
मैं थक कर सो गया था
मेरे कैदी से कोलाहल को शान्ति की चादर उढाओ 
कफ़न जो कह रहे हैं लोग
उनको नादान समझ कर माफ़ कर देना
यह सफ़र पूरा हुआ ...
जब हवा का कोई झोंका तुम्हें स्पर्श करके गुजर जाए
मेरी याद को तुम याद कर लेना
तुम जहाँ  थे मैं वहाँ पहले भी नहीं था
एक आकार का अहसास था
और अब
एक अहसास का आकार हूँ
मैं जैसा हूँ स्वीकार कर लो
मैं जी कर भी तुम्हारा था
मैं मर कर भी तुम्हारा हूँ .
" ----राजीव चतुर्वेदी  

मैं जी कर भी तुम्हारा था, ... मैं मर कर भी तुम्हारा हूँ

" ज़िंदा विश्वासों में लाशों सा अहसास ,
संवेदना के शब्द बोझिल हैं बहुत ,-- ढोए नहीं जाते
मैं थक कर सो गया था
मेरे कैदी से कोलाहल को शान्ति की चादर उढाओ 
कफ़न जो कह रहे हैं लोग
उनको नादान समझ कर माफ़ कर देना
यह सफ़र पूरा हुआ ...
जब हवा का कोई झोंका तुम्हें स्पर्श करके गुजर जाए
मेरी याद को तुम याद कर लेना
तुम जहाँ  थे मैं वहाँ पहले भी नहीं था
एक आकार का अहसास था
और अब
एक अहसास का आकार हूँ
मैं जैसा हूँ स्वीकार कर लो
मैं जी कर भी तुम्हारा था
मैं मर कर भी तुम्हारा हूँ .
" ----राजीव चतुर्वेदी  

Sunday, June 16, 2013

इतिहास में यह भी शायद इस बार लिखा जाए क़ि ...

"ताब्दियों बाद जब इस देश का इतिहास लिखा जाएगा तब इतिहासकारों द्वारा इस देश के उपहासकारो का चर्चा होगा ...लिखा जाएगा भारत मुगलों, अंग्रेजों के अलावा इटली का भी गुलाम रहा ...सभी सरदार राष्ट्र भक्त और स्वाभिमानी नहीं होते कुछ मनमोहन सिंह जैसे भी होते हैं ...नीतिश कुमार बिहार का आख़िरी मुग़ल शासक था ...मुलायम सिंह सत्ता का हसीन सपना देखने वाले  आख़िरी मुंगेरी लाल थे  ...दिग्विजय सिंह को अपने मुग़ल होने का मुगालता था और मुगलों का मानना था कि अपनी कौम से दगा करने वाला किसी का सगा नहीं हो सकता ...बच्चे निबन्ध लिखेंगे कि आतंकियों के मुकदमें वापस लेने के प्रयास से अखिलेश अल -कायदा को क्या फ़ायदा दे सके . इनकी समाजवादी सरकार में 'समाज' सहमा हुआ था और 'वाद' बकैती कर रहा था . क़ानून व्यवस्था में आम आदमी आतंकित था और आतंकियों को सरकार जेल से बाहर निकालने की जुगत में थी जैसे जेल आतंकियों के लिए नहीं आतंकितों के लिए बनी हो   ...कश्मीर भारत का हिस्सा कम मुग़ल सल्तनत अधिक थी  ...रजिया सुलतान की तरह एक थीं कांसीराम की बहन मायाबती किन्तु रजिया की तरह वह गुण्डों में कभी नहीं फंसी सिवा गेस्ट हाउस काण्ड के ...उच्च न्यायालय का जज बनाने की जुगत जिस्मानी भी थी रूहानी भी और कहानी भी . महेश्वरी आढ़त के अलावा अभिषेक मनु सिंघवी के योग शिविर में भी चरित्र का अनुलोम विलोम करना पड़ता था ...लश्कर -ऐ -तैयबा की आत्मघाती इशरत जहाँ को मार गिराने वाले पुलिस अधिकारियों पर मुकदमा चलाया गया था ...मंहगाई से त्रस्त हरजिंदर का थप्पड़ खाने के बाद शरद पवार का राजनीतिक पतन शुरू हो गया था ...ह्त्या कर रहे नक्सलियों के मानवाधिकार सब पर भारी थे ...भारत देश में दूसरे नम्बर के बहुसंख्यकों को अल्पसंख्यक कहा जाता था ...संविधान जातिप्रथा को वर्जित करता था किन्तु जाति के आधार पर आरक्षण दिया जा रहा था ... सामाजिक न्याय से प्रेरित भेंसों और गधों ने घुडदौड़ में अपनी आबादी के हिसाब से आरक्षण की माँग की थी ...हर नया संसदीय सत्र पुराने घोटाले को भूल कर नए घोटाले पर चर्चा करता था और उस अन्जाम तक न पहुँचने वाली चर्चा पर खूब खर्चा करता था ...जिस खेल को विश्व के दस प्रतिशत देश भी नहीं खेलते थे उस क्रिकेट की भारत में लोकप्रियता थी ...क्रिकेट और फिल्म से देश के नायक आ रहे थे और यह क्रिकेट और फ़िल्मी नायक दरअसल एक खलनायक दाउद इब्राहिम के गुर्गे थे ...देश में कुछ घोटालेबाज चटवाल, कुछ घोषित आतंकी , कुछ दाउद की मुम्बईया फ़िल्मी रखेलें भी पद्म पुरुष्कार पा रही थीं ...यों तो इस कालखण्ड देश हत्यारों से आक्रान्त था पर फिर भी कुछ लोग गांधी जी की ह्त्या को जायज ठहरा रहे थे और हत्यारे गौडसे को महिमा मंडित कर रहे थे, तो दूसरे लोग नक्सली हत्यारों को जायज ठहरा रहे थे, तीसरे लोग इस्लामिक आतंकवादीयों के कातिलों के कसीदे पढ़ रहे थे , अपनी सामूहिक हत्याओं से छुब्ध एक समुदाय के लोग स्वर्ण मंदिर में भिण्डरावाले जैसे कातिल को महिमामंडित कर संतों /गुरुओं के समकक्ष रख रहे थे कुल मिला कर पूरे राष्ट्र में कातिलों के पक्ष में क़त्ल हो रहे लोग लामबंद हो रहे थे ...हिन्दुओं के छह हजार मंदिर तोड़ने का कोई चर्चा नहीं था पर इससे उकताए लोगों ने जब एक बाबरी मस्जिद तोड़ दी तो अंतरराष्ट्रीय श्यापा था ...हिन्दूओं में लोग अपनी बेटी का नाम 'रति' रखते थे और मुसलमानों में 'सूफियान' जैसे नाम बहुत प्रचलित थे पर इस्लाम के लिए बहुत कुछ करने वाले नाम 'औरंगजेब' का प्रचलन ही ख़त्म हो चुका था ...कोई अपनी औलाद का नाम 'औरंगजेब' नहीं रखता था ...राष्ट्र में एक महाराष्ट्र भी था जहां जहाँ देश के अन्य प्रान्तों के लोग उतने ही असुरक्षित थे जितने भारतवासी ऑस्ट्रेलिया में ...और ...और इतिहास में यह भी शायद इस बार लिखा जाए क़ि इस बार भी इतिहासकार उतने ही वैचारिक बेईमान थे जितने पहले के इतिहासकार ...इतिहासकार गुजरे समय की सीवर की सफाई करते रहे हैं उन्होंने गुजरे समय के सूरज की समीक्षा ही कब की है ?" ----- राजीव चतुर्वेदी  

Sunday, June 9, 2013

अंतिम चीख प्रथम कविता का उनवान लिखा करती है

" कविता कुछ के लिए कथा है
कविता कुछ के लिए प्रथा है
कविता मेरे लिए व्यथा है
वारिश में भींगे कुछ लावारिश से शब्द हमारी सिसकी हैं ,
साहित्य का प्रयोजन
और आयोजन उनका
तुम्हारे लिए मनोरंजन है
और हमारे लिए
चीख का दस्तावेज़
व्याकरणों से दूर आचरणों को आकार दे रहा शब्दों से
आग्रह की अकादमी में तुम संग्रह करते हो विग्रह की कथित कवितायें
है कर्ज तो तुम पर करुणा का
पर फर्ज तुम्हारा फ़र्जी है
कविता की गुणवत्ता की यह भी तो एक कसौटी है
हर सिसकी पर सिसमोग्राफ हिले थोड़ा
शब्दों की सम्प्रेषणता से रिक्टर स्केल सहम जाए
सिंथेटिक साहित्य शून्य का सृजन किया करता है
तब अंतिम चीख प्रथम कविता का उनवान लिखा करती है ."

                                                   ---- राजीव चतुर्वेदी

Monday, June 3, 2013

क्रान्ति एक नए राजनीतिक आविष्कार का संस्कार है

"कुछ यथावत की पोषक शक्तियाँ भी कभी -कभी क्रान्ति कराहती हैं ...कुछ क्रान्ति को कनस्तर में भरे घूम रहे हैं ...कुछ क्रान्ति के कुटीर उद्योग चला रहे हैं  ...कुछ क्रान्ति के कीचड में किलोलें कर रहे हैं ...कौन समझाए कि क्रान्ति हताशा का स्थानान्तरण है ...विवशता का व्याकरण है ...राजनीतिक संक्रमण है ...किसी तानाशाह का अतिक्रमण है ...क्रान्ति का लक्ष्य लोकतंत्र नहीं होता, पड़ाव लोकतंत्र होता है ...यों तो क्रान्ति के नाम पर जो भ्रान्ति है उसमें फ़िल्मी "क्रान्ति " में मनोज कुमार "चना जोर गरम" बेच देते हैं ...साहित्यिक क्रान्ति की भ्रान्ति में लोग साहित्य और संवेदनाएं तक बेच देते हैं ...कुछ शातिर निजी स्वार्थों की खातिर क्रान्ति की भ्रान्ति में समाज की संभावना तक बेच देते हैं ...क्रान्ति एक बेहतर वैकल्पिक व्यवस्था की परिकल्पना है जिसके लिये पुरानी को ढहाना और नयी व्यवस्था का निर्माण जरूरी है ...क्रान्ति प्रायः तब होती है जब निजी स्वार्थों से ऊपर उठा कोई योद्धा किसी दार्शनिक /संतमना विचारक का साथ पाता है जैसे अर्जुन -कृष्ण का , एलेक्जेंडर (सिकंदर ) सुकरात -प्लेटो की परम्परा का, चन्द्रगुप्त चाणक्य का, फ्रांस की क्रान्ति में रूसो -वोल्टेयर का, लेनिन ,माओ ,फीडल कास्ट्रो को मार्क्स-एंजिल्स (हीगल ) का , गांधी को बाल गंगाधर तिलक का ...ऐसे कई उदाहरण हैं जो स्वयं में महान योद्धा और महान विचारक भी थे पर इन दोनों ऊर्जाओं में परस्पर संतुलन नहीं बैठाल सके और इसीलिए वह महान लोग अपने लक्ष्य नहीं पा सके जैसे भगत सिंह, राम मनोहर लोहिया ...हर क्रान्ति एक नए राजनीतिक आविष्कार का संस्कार है ." -----राजीव चतुर्वेदी  

Sunday, June 2, 2013

तुम्हारा नाम चाँदनी किसने रखा ?

" तुम्हारा नाम चाँदनी किसने रखा ?
भले घर की सी दिखती हो
सो जाओ
मैं थका हारा सा सूरज हूँ
सुबह उठना है मुझे
फिर युद्ध करना है
उजालों की लड़ाई में मैं घायल हूँ
तुम्हारी संवेदना मुझको साजिश सी लगती है
भले घर की सी दिखती हो
सो जाओ
तुम्हारा नाम चाँदनी किसने रखा ?
" ----- राजीव चतुर्वेदी

Saturday, June 1, 2013

सच तो यह है कि सिद्धांत सभी स्थिर हैं सारे

" चीखती चिड़िया
और
चील की शान्ति
में से
क्या चुनोगे ?
सच बताना
महक फूलों की अच्छी थी
तो तोड़ा क्यों उन्हें ?
चहक चिड़िया की अच्छी थी
तो पिंजडा क्यों बना ?
तुम सभी के थे
तो मेरे क्यों हुए ?
शिखर पर तुम चढ़े
फिर लौट आये क्यों ?
ठहर जाओ
क्षितिज के पार मरीचिका विश्राम करती है
ठहरो तुम ज़रा
तुम्हारी गतिशीलता भ्रम बनाती है
सच तो यह है कि
सिद्धांत सभी स्थिर हैं सारे .
" ----राजीव चतुर्वेदी

Friday, May 17, 2013

हिन्दी -दोहरी निष्ठा लेकर प्रतिष्ठा की लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती

"दोहरी निष्ठा लेकर प्रतिष्ठा की लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती ...प्रतिष्ठा के लिए एकनिष्ठ होना पड़ता है . भारतीय भाषाओं और समाज के साथ यही विडंबना है . भारत में रहने वाले यहाँ तक की जिनका जिनके पुरखों का भी जन्म यहीं हुआ उनके तीर्थ, उनकी आस्था और निष्ठा अरब देशों में बसती है ...पाकिस्तान में बसती है पर भारत में नहीं उनकी दोहरी निष्ठाएं हैं इसी लिए अरब देशों में यह दोयम दर्जे के नागरिक हैं ,पाकिस्तान में मुहाजिर हैं और भारत में संदेहास्पद।
जिन महिलाओं की शादी के बाद दोहरी निष्ठा होती है वह मायके और ससुराल के बीच त्रिशंकु सी टंगी रहती हैं और उनके परिवार टूट ही जाते हैं ...दोनों ही जगह वह संदेहास्पद होती हैं।
हिन्दी भाषा को भी दोहरी निष्ठा से ख़तरा है ...हिन्दी अंग्रेजी से नहीं पराजित है हिन्दी अपने गर्भ से जन्मी उन भाषाओं के कारण टूट रही है जिनकी वर्तनी और लिपि देवनागरी है ....हिन्दी भाषी समाज में दोहरी निष्ठा हिन्दी के लिए वैसे ही घातक है जैसे देश में रह रहे मुसलमानों की दोहरी निष्ठा या विवाहित स्त्री की दोहरी निष्ठा। हिन्दी की कोख से जन्मी वह भाषाएँ जिनकी लिपि और वर्तनी देवनागरी है हिन्दी भाषी समाज को एकनिष्ठ नहीं होने दे रही और  दोहरी निष्ठा लेकर प्रतिष्ठा की लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती ...हिन्दी भाषी समाज की दोहरी निष्ठा हैं ...भोजपुरी समाज अलग है ...कुमायूनी अलग ...गढ़वाली अलग ...बृजभाषी अलग हैं ..अवधी अलग ...बुन्देलखंडी अलग ...  रूहेलखंडी अलग ...हम विखंडन की प्रवृत्तियों के खण्डित निष्ठा वाले लोगों को साथ ले कर भला अखण्ड भारत अखण्ड समाज की कल्पना भला कैसे कर सकते हैं ? निष्ठा के प्रश्न पर खण्डित लोगों को ले कर अखंडता का पाखण्ड ? ....हिन्दी को आज सबसे बड़ा ख़तरा हिन्दी के बहिरुत्त्पाद जैसी विकसित हुयी भोजपुरी, कुमायूनी, गढ़वाली, बृजभाषा, बुन्देलखंडी,रुहेलखंडी, अवधी भाषाओं और इन भाषाओं के प्रति निष्ठा रखने वाले समाज से है  ...निजी प्रतिष्ठा के लिए ...भारत की प्रतिष्ठा के लिए ...हिन्दी की प्रतिष्ठा के लिए हमें एकनिष्ठ होना ही पडेगा ...दोहरी निष्ठा किसी एक के साथ छल है ...दोहरी निष्ठा लेकर प्रतिष्ठा की लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती .
" -----राजीव चतुर्वेदी


Sunday, May 12, 2013

हर उस स्त्री को प्रणाम जिसके मन में ममता है


"गर यह युग पूछ सकता तो पूछता कर्ण की माँ से माँ बनने का सबब ... अगर यह युग पूछ सकता तो पूछता मरियम से माँ बनने का सबब ... अगर यह युग पूछ सकता तो पूछता फातिमा से माँ बनने का सबब ...आज भी बहुत सी लडकियां माँ तो बनती हैं पर लोकलाज के कारण यह सच छिपाने को अभिशिप्त हैं ...हमारी संस्कृति में "ममता" नारी स्वभाव है ...गुण है ...विशेषण है ... तभी तो लोग अपनी कुमारी बेटियों का नाम भी ममता रखते हैं ...लेकिन सभ्य समाज में भी किसी स्त्री के "माँ" बनने का लाईसेंस समाज जारी करता है ...ममता वह रिश्ता है जिसके लिए विवाह नहीं निर्वाह जरूरी है ...हर उस स्त्री को प्रणाम जिसके मन में सभ्यता,सृजन और संस्कृति के प्रति ममता है .
      तमाम तरह के वैज्ञानिकों को एक जगह इकट्ठा कर दें . उनको चोकर /भूसा /बरसीम और जो कुछ मांगें वह भी दे दें पर वह दूध नहीं बना सकते क्योकि इस सब के अलावा दूध बनाने के लिए चाहिए ममता का रसायन जो सिंथेटिक नहीं होता ...वह कहाँ से लाओगे ?"
        यह वनस्पति की ममता है कि अन्न हो रहा है ...यह गाय /भेंस /बकरी आदि की ममता है कि दूध हो रहा है ...यह मुर्गी की ममता है जिसे अण्डा आप खा रहे हैं ...ममता नहीं होगी तो यह सभ्यता भूखी कुपोषित ही मर जायेगी --- प्रकृति में माँ की प्राकृतिक भूमिका और ममता को प्रणाम ...गौर से देखो धरा,धरणी , प्रकृति, बेटी ,पत्नी ,प्रेमिका ,महिला मित्र सभी में ममता है ...ममता स्त्री का आवश्यक और अपरिहार्य प्राकृतिक गुण है ....सभी प्रकार की प्राकृतिक ममता को प्रणाम !!
" ---- राजीव चतुर्वेदी


Tuesday, May 7, 2013

अँधेरे अकादमी पुरुष्कार देने के लिए चमगादड़ की तलाश में हैं

"आश्वस्त रहो
अँधेरे अकादमी पुरुष्कार देने के लिए चमगादड़ की तलाश में हैं
बंद कर दो सभ्यता की सभी खिड़की झरोखे और रोशनदान
सूरज की सूरत से नफरत है इन्हें
सूर्य के संकोच से कुछ तितलियाँ दहशतजदा हैं
और तुम भी जानते हो --
रोशनी बिजली के बिल की हो या दिल की
कीमत तो चुकानी है
यह दौर ऐसा है यहाँ हर रोशनी बिकती है बाजारों में
हर उजाला तिरष्कृत है
हर अँधेरा पुरष्कृत है
हर विकृति चमत्कृत है
चमगादड़ की चर्चा सुन कर सूरज सुबक-सुबक कर सो जाता है
सच की सरकारी ड्योढी को शाम ढले क्या हो जाता है
सहमी सी हर लालटेन को आंधी भी औकात बताती गुजर रही है
चमगादड़ के मानक कितने भ्रामक होंगे
किन्तु अन्धेरा अधिकारों का सृजन कर रहा
चमगादड़ के चालीसे पढ़ती तितली क्यों तुतलाती सी है ?
"

-----राजीव चतुर्वेदी

च्यवनप्राश बहुत मँहगा है

"च्यवनप्राश बहुत मँहगा है
माँ , मेरे पास अब कुछ भी नहीं
सिवा तेरे दिए दीर्घायु होने के आशीर्वाद के
वह दठोना तो कब का मिट गया
जो तैने लोगों की बुरी नज़र न लगने के लिए लगाया था
तेरे रहने तक मैं दीर्घायु नहीं होना चाहता था
अब मेरा छोटा सा बेटा है
मैं चाहता हूँ वह दीर्घायु हो
पर च्यवनप्राश बहुत महगा है
बाहर चल रही हैं विषैली हवाएं
दवाएं बहुत महगी हैं
दुआएं मिलती नहीं बाज़ार में
इस गंदी दुनियाँ में गुजारा कर लिया मैंने
अब गुजर जाऊं तो अफ़सोस मत करना
तुम्हें फिर भी दीर्घायु होना है
क्योंकि दवाएं नकली ,दुआएँ फर्जी
और च्यवनप्राश बहुत मँहगा है .
" -----राजीव चतुर्वेदी

Friday, May 3, 2013

वैश्यालय का कुटीर उद्योग है Live in Relationship

"लिव इन रिलेशनशिप पर वीभत्स सी बहस चल पडी है ...Live in Relationship Vs. Dye in Relationship . Live in Relationship की परिणिति पुरुषों के लिए छिनरफंद की आज़ादी और महिलाओं का Sexual Apparatus में बदल जाना ही है और जब महिला मनुष्य नहीं महज Sexual Apparatus हो जायेगी तो उसका यानी मशीन का Depreciation यानी अवमूल्यन तो होगा ही . यही नहीं हम कालान्तर में बेटी /बहन /माँ /भाभी जैसे एक महिला के बहुरंगी रिश्ते भी खो देंगे ...एक दिन वह भी आयेगा जब Charted Plane /Charted Taxi की ही तरह Charted Sexual Apparatus होंगे . Animal Sex का दौर शुरू होगा ...महिला और पुरुष जब तक Sexual Apparatus की कार्यकुशल मशीन होंगे तभी तक अर्थ रखेंगे वरना व्यर्थ हो जायेंगे ...चूंकि धन पर अभी पुरुष आधिपत्य है अतः प्रौढ़ /बूढ़ी महिलायें वक्त के कूड़ेदान में डाल दी जायेंगी ...स्त्री का सामाजिक/ आर्थिक अवमूल्यन होगा जिसमें 40 वर्ष से ऊपर की महिला घटी दर पर, 50 वर्ष के ऊपर की महिला फटी दर पर और 60 साल के ऊपर की महिला दरबदर हो कर दर -दर की ठोकर खायेगी ...जवान महिला अगर बीमार हुयी तो लाबारिश हो जायेगी ...बृद्धाअवस्था आश्रमों में भीड़ लग जायेगी ...परिवार संस्थाएं टूट जायेंगी ...वैश्यालय का कुटीर उद्योग है Live in Relationship ." -----राजीव चतुर्वेदी

Tuesday, April 30, 2013

क्रान्ति का तेरा करिश्मा झूठ का सारांश था

"क्रान्ति का तेरा करिश्मा झूठ का सारांश था
तुमने जब दीवारें ढहा दीं तो छत कहाँ बाकी बची ,
वक्त की वहशी हवाएं और सर पर आसमाँ 
भूख तेरी, खेत मेरे , आढ़तें आज भी उनकी
तुमने खेतों में कॉलोनी बसा दी, रोटी कहाँ बाकी बची .
जब कभी हैरत से वह देखने लगता है तेरी समृद्धि को
तो समझ लेना क़ि उसमें गैरत कहाँ बाकी बची
." ----राजीव चतुर्वेदी

Sunday, April 28, 2013

चीख तिरष्कृतों का सर्वश्रेष्ठ साहित्य है

"आज चीखने का मन कर रहा है
मैं चीखना चाहता हूँ शहर की सबसे ऊंची इमारत पर चढ़ कर
मैं चीखना चाहता हूँ इस दौर की सबसे गहरी खाई में उतर कर
मैं चीखना चाहता हूँ सन्नाटे में आहट बन कर
संसद हो या सर्वोच्च न्यायलय या समाचार
सभी में लोग सुबकते हैं चीखते क्यों नहीं ?
मैं चीखूंगा तुम्हारे शालीन सहमे से मौन पर चस्पा इबारत की तरह
मैं चीखूंगा इसलिए कि
चीख पुरुष्कृतों  की आत्ममुग्ध बस्ती में
तिरष्कृतों का सर्वश्रेष्ठ साहित्य है .
"------  राजीव चतुर्वेदी

Wednesday, April 24, 2013

मेरे लेखन का मूल्यांकन साहित्य अकादमी नहीं सिसमोग्राफ करेगा

"मेरे लेखन का मूल्यांकन
साहित्य अकादमी नहीं
सिसमोग्राफ करेगा
और एक दिन नापी जायेगी उसकी तीव्रता
रिक्टर स्केल पर
भूगर्भ के सन्दर्भ साहित्य में स्वीकार कर लेना
धरती और शब्द जब करवट बदलते हैं
तो एक सभ्यता सहम जाती है
और ढह चुकी सभ्यता के मलवे में फूटती हैं नयी कोंपल
भूगर्भ के सन्दर्भ साहित्य में स्वीकार कर लेना
मेरे लेखन का मूल्यांकन
साहित्य अकादमी नहीं
सिसमोग्राफ करेगा
और एक दिन नापी जायेगी उसकी तीव्रता
रिक्टर स्केल पर .
" -----राजीव चतुर्वेदी

Tuesday, April 23, 2013

कहाँ गए कामोद्दीपन करने वाले कमीने ?


"कहाँ गए कामोद्दीपन करने वाले कमीने ...यह सेक्स की संस्कृति और उसकी विकृति बेचते मुम्बई के फ़िल्मी रंडी -भडुए ...भोजन से कुपोषित समाज का कामोद्दीपन करके देह बाजार का जो व्यापार अश्लीलता परोसती मुम्बईया फ़िल्मी संस्कृति ने किया है ...अश्लील गानों के बाजार में परोक्ष सेक्स बेचने बाले यह रंडी -भडुएनुमा गायक ... भोजपुरी के टेम्पू /ऑटो /बसों में बजते अश्लील गाने समाज में कामोद्दीपन करने में सफल हुए परिणाम फ़िल्में हाउसफुल हुयी ...देह व्यापार के अड्डे गुलजार हुए ...गानों की सीडी खूब बिकीं और समाज में कामुकता की भूख अन्तुलन की हद तक प्रचण्ड हो गयी ...भाषाएँ ही नहीं परिभाषाये भी क्रय क्षमता के अनुसार रातों रात बदल गयीं देखिये --- गाँव के जमींदार के यहाँ शादी में पांच हजार ले कर जो नाचे वह "रंडी" और दुबई में दाउद के यहाँ शादी में पचास लाख ले कर नाचे वह भारत की सांस्कृतिक राजदूत ऐश्वर्य राय . कामोद्दीपन से फिल्मों के ग्राहक बढे, अश्लील गानों के एलबम के ग्राहक बढे, कॉल गर्ल्स के ग्राहक बढे, देह व्यापार के अड्डों के ग्राहक बढे, शराब शबाब के ग्राहक बढे , कंडोम और उत्तेजक दवाओं के ग्राहक बढे ...इन धंधों से जुड़े लोग रातों रात मालदार होगये ...मालदारों पर फर्क नहीं पडा ...मध्यमवर्ग गरीब होने लगा ...और गरीब गुनाह करने लगा ...बच्चियों पर होते बलात्कार की घटनाओं पर गौर करें --- भुक्तभोगी भी गरीब या निम्नमध्यम वर्ग से हैं और अभियुक्त भी गरीब या निम्न माध्यम वर्ग से हैं ...जो वर्ग सेक्स खरीद नहीं सकता वह सेक्स की लूट /डकैती /राहजनी कर रहा है ...देश की कृषि और ऋषि परम्परा की संस्कृति देह व्यापार के विकृत बाजार में बदल दी गयी है ...पहले वातावरण में गूंजता था ॐ , अब गूंजता है कन्डोम ...कमीनो ने कामोद्दीपन करके कहाँ ला दिया ...अब हमारी बेटियाँ असुरक्षित हैं ...अब जो सेक्स खरीद नहीं सकता वह सेक्स की राहजनी कर रहा है ." -----राजीव चतुर्वेदी    

आखिर "नेता" की परिभाषा क्या है ?

"नेता" किसे कहा जाए ? आखिर "नेता" की परिभाषा क्या है ? नेता शब्द संस्कृति से आया है "नेता" वह जो नयन व्यापार करे यानी किसी चिन्हित लक्ष्य तक ले जाने का काम करे . Some time "actual meaning" of a word is different than the "notional meaning" . "Leader" is also one of the same . यहाँ "संगठन" और "गिरोह" के अंतर को भी समझना जरूरी है . संगठन सिद्धांतनिष्ठ होता है और गिरोह व्यक्तिनिष्ठ . नेता या Leader वह व्यक्ति होता है जो उस संदर्भगत तात्कालिक समाज को ऊष्मा का सुचालक बना कर अपने द्वारा लागू सांगठनिक अनुशाशन का अनुपालन करने को प्रेरित कर पालन भी करवाए . नेता वह व्यक्ति इकाई है जिस पर किसी चिन्हित उद्देश्य या विश्वास को लेकर अन्य बिखरी हुयी व्यक्ति इकाईयां आलाम्बित और घनीभूत (polarize ) होती हैं . नेता संगठन और संगठन के विघटन का कारक तत्व होता है पर गिरोह का नहीं . गिरोह में नेता नहीं होता सरगना होता है . आज कल प्रायः सभी राजनीतिक दल "संगठन" नहीं "गिरोह" है क्योंकि संगठन सिद्धांतनिष्ठ होता है और गिरोह व्यक्तिनिष्ठ ." -----राजीव चतुर्वेदी

Monday, April 22, 2013

मैं अंगारे सिरहाने रख कर सोया था

"चिंगारी चीखती है, मैं अंगारे सिरहाने रख कर सोया था ,
देश जब जलता हो तो सपने नहीं सदमें ही आते हैं .
"
-----राजीव चतुर्वेदी

तुम कविता में तुकबन्दी के माहिर हो

"तुम कविता में तुकबन्दी के माहिर हो ,
मैं तीखे तर्कों से पैगाम दिया करता हूँ
तुम इष्ट साधना को अभीष्ट समझे हो
मैं विवश वेदना को आकार दिया करता हूँ .
"
----राजीव चतुर्वेदी

समय का बहाव है

"समय का बहाव है इस दौर में इतना ही तेज ,
जो जहाँ डूबता है उसका शव वहाँ नहीं मिलता .
"
----राजीव चतुर्वेदी

कब्रिस्तान में...

"कब्रिस्तान में दफ़न होते हैं
ना जाने कितने रिश्ते
ना जाने कितने नाम
ना जाने कितने बदनाम
ना जाने कितने गुमनाम
ना जाने कितनी रंजिशें
ना जाने कितने राग , ना जाने कितने रंग
कब्रिस्तान के पास से गुजरो तो हवा कुछ फुसफुसा कर कहती है
उग आती है कोई याद
और लोहबान की सुगंध ओढ़ कर सोया कोई रिश्ता
मैं आऊँगा एक दिन और सो जाऊंगा चुपचाप
अपनों के बीच में .
" ----राजीव चतुर्वेदी

Sunday, April 21, 2013

देश जब जलता हो तो सपने नहीं सदमें ही आते हैं

"चिंगारी चीखती है, मैं अंगारे सिरहाने रख कर सोया था ,
देश जब जलता हो तो सपने नहीं सदमें ही आते हैं .
"
-----राजीव चतुर्वेदी

Thursday, April 18, 2013

अब ज़मीर स्मरण की नहीं संस्मरण की चीज है

"जब मेरा जमीर मर चुका था
तब मेरे यहाँ शब्दों ने जन्म लिया
ज़मीर तो मर चुका था सो उसका ही अभाव था
मेरे शब्द जागीर के प्रभाव और ज़मीर के अभाव में बड़े हुए
आज मेरे शब्द ज़मीर ज़मीर जपते हैं
यह सभ्यता के सैधांतिक कुपोषण की कहानी है
मैं जानता हूँ तुम्हारा भी ज़मीर बहुत पहले ही मर गया था
अब ज़मीर स्मरण की नहीं संस्मरण की चीज है
ज़मीर की दुहाई देती मेरी बात तुम्हें जरूर अच्छी लगेगी
जिसके पास जो नहीं होता उसको उसकी ही जरूरत जो होती है ."
-----राजीव चतुर्वेदी

Wednesday, April 10, 2013

बंद लिफ़ाफ़े में खुले ख्वाब कोई छोड़ गया

"वही दर्द है ...वही दरवाजे ...वही डाकिया,
मुद्दतों से मुझे दस्तक का इंतज़ार है
हवा भी शैतान बच्चे सी सांकल हिला के भाग गयी
बंद लिफ़ाफ़े में खुले ख्वाब कोई छोड़ गया
हिचक मुझे भी थी पर मेरी हिचकियाँ बताती थीं
जिस तकिये में तश्वीर रखी थी उसकी
उस तकिये की तासीर तबस्सुम जैसी थी
और दिलों की धड़कन में जो पदचाप सुनाई देती थी वह तेरी थी
वही दर्द है ...वही दरवाजे ...वही डाकिया,
मुद्दतों से मुझे दस्तक का इंतज़ार है
हवा भी शैतान बच्चे सी सांकल हिला के भाग गयी
बंद लिफ़ाफ़े में खुले ख्वाब कोई छोड़ गया.
" -----राजीव चतुर्वेदी

Saturday, April 6, 2013

धर्म को राजनीति का उपकरण बनाने की विभीषिका

"संस्कृतियों में सांस्कृतिक युद्ध जब होता है तो उसे शास्त्रार्थ कहते हैं ...संस्कृतियों में जब सतही वैचारिक युद्ध होता है तो वह बहस होती है ...संस्कृति एक निरंतर संशोधनरत सलीके से जीने के आविष्कार करती जीवन पद्धति है और राजनीति इसका हिस्सा होती है ...पर शातिर लोग इसका उलटा कर राजनीति का हिस्सा संस्कृति को बना लेते है ...संस्कृति जब तक जीवन और आचरण का व्याकरण बनी रहती है मानव कल्याण के प्रयोग होते रहते हैं किन्तु संस्कृति जब जीवन और आचरण का व्याकरण न रह कर राजनीति का उपकरण बनती है तो हिंसक युद्ध होते हैं ...इसका परिणाम और प्रमाण एशिया का सांस्कृतिक /राजनीतिक पटल है ...धार्मिक या यों कहें क़ि सांस्कृतिक रूप से एशिया पूरे विश्व पर राज्य कर रहा है फिर चाहे भारतीय भूभाग से उत्पन्न सनातन धर्म हो या आर्य समाज या बुद्ध धर्म अथवा यरुसलम से शुरू हुआ ईसा मसीह द्वारा प्रतिपादित ईसाई धर्म हो या इस्लाम या यहूदी ...पर विडंबना यही क़ि संस्कृति/ धर्म जीवन का व्याकरण न हो कर राजनीति का उपकरण बन गयी ...धर्म साधना नहीं राजनीति का साधन बन गया और फिर वही हुआ जो होना था --"युद्ध" ...प्रबुद्ध युद्ध करने लगे और प्रयोग हुआ आम आदमी ...होना चाहिए था क़त्ल-ए-ख़ास पर हुआ क़त्ल -ए -आम ...काबुल-कंधार से कुछ सौ मुसलमान आये और सत्ता के लिए भारतीय संस्कृत पर हमला बोल दिया . पंडितों की शिखा /यज्ञोपवीत उखाड़ कर ले गए , ठाकुर साहब की मूंछें उखाड़ ले गए, हजारों मंदिर तोड़ गए ...इस्लाम वह धर्म था जिसकी प्राथमिकता "दारुल हरब " यानी इस्लाम का राज्य स्थापित करने की मंशा थी ... इसके बाद इस संस्कृति और राजनीति के संकर संस्करण पर ईसाईयों ने हमला बोला तो वह मुल्लों की दाढी उखाड़ ले गए ...उधर येरुसलम में भी यहूदियों ने इस्लाम के मुल्लों को पीट पीट कर पीला कर दिया ...यह धर्म को राजनीति का उपकरण बनाने की विभीषिका थी ." ----राजीव चतुर्वेदी

Friday, April 5, 2013

परिदृश्यों के बीच गुजरती एक परी सी शब्दों की ---वह कविता है

"सुबोध और अबोध के सौन्दर्यबोध के बीच
कविता लफंगों की बस्ती से गुजरती सहमी लडकी सी
साहित्यिक सड़क पर चल रही है
कुछ के लिए श्रृंगार है
कुछ के लिए प्रतिकार है
कुछ के लिए अंगार है
कुछ के लिए प्यार का इजहार है
कुछ के लिए साहित्य की मंडी या ये बाजार है
कुछ शब्द अभागन से
कुछ शब्द सुहागन से
कुछ सहमे से सपने
कुछ बिछड़े से अपने
कुछ दावानल से दया मांगते देवदार के बृक्ष काँखते कविता सा कुछ
कुछ की गुडिया
कुछ की चिड़िया
कुछ नदियाँ कलकल बहती सी
कुछ सदियाँ पलपल गुजर रहीं
वह हवा ...हवा में तितली सी इठलाती सी वह याद तुम्हारी
वह तुलसी का पौधा ...पौधे की पूजा करती माताएं
वह गोधूली में घर आती वह गाय रंभाती सी
वह बहनों का अंदाज़ निराला सा
वह भाभी का तिर्यक सा मुस्काना
वह दादी की भजनों में भींगी बेवस कराह
वह बाबा का प्यार में डांट रहा खूसट चेहरा
कविता में अब लुप्तप्राय सी माँ बहनों और याद पिता की
बेटी पर तो इक्का दुक्का दिखती हैं पर बेटों पर प्रायः नहीं दिखी कविता
कुछ काँटों से चुभते हैं
कुछ प्रश्न यहाँ हिलते हैं पत्तों से
कुछ पतझड़ में सूखे पेड़ यहाँ रोमांचित से
कुछ मुरझाये पौधे गमलों में सिंचित से
वह गौरैया के झुण्ड गिद्ध को देख रहे हैं चिंतित से
इन परिदृश्यों के बीच गुजरती एक परी सी शब्दों की
---वह कविता है .
" ----राजीव चतुर्वेदी

Wednesday, April 3, 2013

कुत्तों से करुणा की बातें क्या करना ?

"कुत्तों से करुणा की बातें क्या करना ?
नालों से वरुणा की बातें क्या करना ?
विषधर की बस्ती में अमृत की बातें क्या करना ?
इन बाजारों में स्नेह नहीं बस देह बिका करती है
इन रंडी -भडुओं से हनुमान की बातें क्या करना ?
गमले के परजीवी से पौधे  देवदार से दावानल के हाल कहा करते हैं
गूलर के भुनगों की ख्वाहिश धरती की पैमाइश की है
गूलर के भुनगों के बंधक कोलम्बस के ख्वाब यहाँ रहते हैं
इन गूलर के भुनगों से कोलम्बस की बातें क्या करना ?
जुगनू के जज्वात सूर्य पर अब भारी हैं
भ्रष्टाचारी लोग यहाँ पर सब सरकारी हैं
राजनीति के लोग जहां पर माल भरा करते हैं
सोचा जज तक पहुंचेंगी मेरी फरियादें
पर जज भी तो है सरकारी
पेशकार को घूस जिसे कहते हैं हम पैरोकारी
कुछ जज भी तो खाते हैं उसकी तरकारी
ऐसे इस जज से न्याय की बातें क्या करना ?
पत्रकार प्रवचन देते हैं अखबारों में , कुछ टीवी से भी झांक रहे
सच की सूरत में यह षड्यंत्रों को ही बाँट रहे
यहाँ दलालों ने सच हलाल ही कर डाला
समाचार की हर आढ़त पर सत्य को बिकता मैंने देखा
समाचार की इस दूकान पर सत्य की बातें क्या करना ?
नौकरशाही महाभ्रष्ट है जनता इनसे बहुत त्रस्त है
मंथरा के इन वंशजों से राम की बातें क्या करना ?       
कुत्तों से करुणा की बातें क्या करना ?
नालों से वरुणा की बातें क्या करना ?
विषधर की बस्ती में अमृत की बातें क्या करना ?
इन बाजारों में स्नेह नहीं बस देह बिका करती है
इन रंडी -भडुओं से हनुमान की बातें क्या करना ?
" -----राजीव चतुर्वेदी

Wednesday, March 27, 2013

जिन्दगी के रंग जब रूठे हों मुझसे,-- क्या करूँ मैं ?

"जिन्दगी के रंग जब रूठे हों मुझसे,-- क्या करूँ मैं ?
रिश्ते रास्तों में कहीं छूटे हों मुझसे ,---क्या करूँ मैं ?
ओढ़ कर तनहाई अपनी सांस की शहनाई सुनता हूँ
अपने अथाही मौन को मैं तोड़ता हूँ अपनी कविता से
संविधानो की शपथ के शब्द जब झूठे हों मुझसे --क्या करूँ मैं ?
" ----राजीव चतुर्वेदी

Sunday, March 24, 2013

हर क्रान्ति एक नए राजनीतिक आविष्कार का संस्कार है

"कुछ यथावत की पोषक शक्तियाँ भी कभी -कभी क्रान्ति कराहती हैं ...कुछ क्रान्ति को कनस्तर में भरे घूम रहे हैं ...कुछ क्रान्ति के कुटीर उद्योग चला रहे हैं ...कुछ क्रान्ति के कीचड में किलोलें कर रहे हैं ...कौन समझाए कि क्रान्ति हताशा का स्थानान्तरण है ...विवशता का व्याकरण है ...राजनीतिक संक्रमण है ...किसी तानाशाह का अतिक्रमण है ...क्रान्ति का लक्ष्य लोकतंत्र नहीं होता पड़ाव लोकतंत्र होता है ...यों तो क्रान्ति के नाम पर जो भ्रान्ति है उसमें फ़िल्मी "क्रान्ति " में मनोज कुमार "चना जोर गरम" बेच देते हैं ...साहित्यिक क्रान्ति की भ्रान्ति में लोग साहित्य और संवेदनाएं तक बेच देते हैं ...कुछ शातिर निजी स्वार्थों की खातिर क्रान्ति की भ्रान्ति में समाज की संभावना तक बेच देते हैं ...क्रान्ति एक बेहतर वैकल्पिक व्यवस्था की परिकल्पना है जिसके लिये पुरानी को ढहाना और नयी व्यवस्था का निर्माण जरूरी है ...क्रान्ति प्रायः तब होती है जब एक निजी स्वार्थों से ऊपर उठा कोई योद्धा किसी दार्शनिक /संतमना विचारक का साथ पाता है जैसे अर्जुन -कृष्ण का , एलेक्जेंडर (सिकंदर ) सुकरात -प्लेटो की परम्परा का, चन्द्रगुप्त चाणक्य का, फ्रांस की क्रान्ति में रूसो -वोल्टेयर का, लेनिन ,माओ ,फीडल कास्ट्रो को मार्क्स-एंजिल्स (हीगल ) का , गांधी को बाल गंगा धर तिलक का ...ऐसे कई उदाहरण हैं जो स्वयं में महान योद्धा और महान विचारक भी थे पर इन दोनों ऊर्जाओं में परस्पर संतुलन नहीं बैठाल सके और इसी लिए वह महान लोग अपने लक्ष्य नहीं पा सके जैसे भगत सिंह, राम मनोहर लोहिया ...हर क्रान्ति एक नए राजनीतिक आविष्कार का संस्कार है ." -----राजीव चतुर्वेदी

Friday, March 22, 2013

वह एकमुश्त कबीर थे और हम सभी किश्तों में कबीर हैं

"कबीर विद्रोही थे ...सत्यवादी थे ...बिना लाग लपेट के सच बोलते थे ...उनका व्यक्तित्व संत तुल्य था यह सभी बातें ठीक हैं ...पर कबीर ने 120 वर्षों की आयु में 1000 साल का ज्ञान समेट दिया यह बात अति रंजित है ...इस एक हजार साल में पचास तरह के विज्ञान और उनकी नयी खोज शामिल हैं ...कबीर कविता के शिल्प या विचार की कसौटी पर महान कवि नहीं थे ...कबीर महान दार्शनिक भी नहीं थे कि उन्होंने नया दर्शन प्रतिपादित किया हो ...कबीर महान प्रणेता या समाज सुधारक भी नहीं थे किन्तु कबीर इन सभी गुणों का एक पॅकेज थे इसलिए विलक्षण और आदरणीय थे ...कबीर इस लिए भी आदरणीय थे कि उन्होंने ज्ञान के अभिजात्य प्राचीर के किसी कोने को तोड़ा था ...लेकिन कबीर सत्य /सुख /प्रेम /पराक्रम के उत्पादक थे या उपभोक्ता यह तो तय करना ही होगा ...हाँ यह बात सही है कि जामुन खा कर भी होठ /गला नीला होजाता है पर समाज का जहर पीने वाला ही नीलकंठ कहलाता है जामुन खाने वाला नहीं ...वह एकमुश्त कबीर थे और हम सभी किश्तों में कबीर हैं ." ----राजीव चतुर्वेदी

Thursday, March 21, 2013

'प्यार' त्रिभुज का चौथा कोना चुप सा बैठा है

"मेरे पास सवाल
तुम्हारे पास उत्तर थे
हम हमेशा एक -दूसरे की प्रतीक्षा में रहे
मिले तो मिले परीक्षा में
अंक पत्रों की समीक्षा में
और फिर मिले ही नहीं
प्रतीक्षा
परीक्षा
समीक्षा
'प्यार' त्रिभुज का चौथा कोना चुप सा बैठा है ."

----राजीव चतुर्वेदी

Wednesday, March 20, 2013

तेरा यह क्रमशः टूटना

"तेरा यह क्रमशः टूटना
मुझे यों तो कभी अच्छा नहीं लगा
पर एक वह दिन भी था जब मुझे अच्छा लगा था
तुम्हारी आशा टूटी
तुम्हारी भाषा टूटी
तुम्हारी हर परिभाषा टूटी
तुम्हारी भावना टूटी
तुम्हारा दिल टूटा
तुम्हारा सपना टूटा
और तुम किश्तों में टूट गए
अन्त में तुम्हारा मौन टूटा
और उस दिन तक स्थापित सच टूट गया
तुम्हारे शब्दों में नया सच उगा
तेरा यह क्रमशः टूटना
मुझे यों तो कभी अच्छा नहीं लगा
पर एक वह दिन भी था जब मुझे अच्छा लगा था
तब तक तो तू टूट चुका था किश्तों में
तब तक तो तू टूट चुका था रिश्तों में
टूट चुके आदमी का जब मौन टूटता है
तो टूटता है किसी अटूट समझे जाने वाले बाँध की तरह
और उस बाँध के किनारे की बस्तियां बह जाती है सच के सैलाब में
तेरा यह क्रमशः टूटना
मुझे यों तो कभी अच्छा नहीं लगा
पर एक वह दिन भी था जब मुझे अच्छा लगा था ."
----राजीव चतुर्वेदी

बहरहाल 'सच ' ज़िंदा नहीं है यह सच है

"किसकी है यह लावारिश लाश ?
'सच' की ...?
पंचायतनामा भरो इसका
पोस्टमार्टम को भेजो
सच के पोस्टमार्टम के बाद ही पता चलेगा
कि 'सच ' की ह्त्या की गयी थी
या 'सच ' ने आत्महत्या करली
बहरहाल 'सच ' ज़िंदा नहीं है यह सच है
और यह भी सच है कि हम ज़िंदा हैं .
" -----राजीव चतुर्वेदी

संशयों में शब्द सीमित ही तो रहते हैं

"संशयों में शब्द सीमित ही तो रहते हैं
ये तुमने क्या कहा ?
भावनाओं को कहीं नज़दीक से छूकर गुजरती
स्पर्श-रेखा सी तुम्हारी याद
शून्य में संगीत देती है
मेरे खून से भी खूबसूरत याद तेरी
मेरे दिल के दरवाजे पर दस्तक दे रही है
और इस धडकनों के शोर में
तेरे अहसास का संगीत आकार लेता है
सुना है समंदर अपने किनारों से टकरा कर
अक्सर लौट जाता है .
" -----राजीव चतुर्वेदी

दारू एक कालजयी, धर्म निरपेक्ष, पतित पावन पेय है


"यद्यपि मैं दारू के स्वाद से अभी तक वंचित हूँ ...यह मेरे पुरखों का संस्कार था या अभिशाप मुझे क्या मालुम ? ...लेकिन यह तय है कि दारू एक कालजयी पेय है ...देवता हों या दानव सभी इसको पी कर टुन्न रहते थे ...सुर सुरा पीते थे ...ससुरे पियक्कड़ ...मौलवी जी बताते हैं कि दारू पीना हराम है तो अपने मजहब के हरामियों की संख्या भी गिन लें वैसे उनको शायद यह नहीं पता कि "अल -कोहल" अरबी का मूल शब्द है ...अजीब तासीर है इस दिव्य पेय की कि पीने वाले के मुंह में बबासीर हो जाता है ...जो देसी पीता है वह देशी गालियाँ बकता है और जो अंगरेजी पीता है वह अंगरेजी गालियाँ बकता है ...दारू रिश्तों में रिरियाती है पर रिश्वत का सबसे कारगर उपाय है ...दारू गांधी के मद्य निषेध के नारे की कब से हवा निकाल चुकी है और सरकारी आय का बड़ा माध्यम है ...एक किस्सा है --मिर्ज़ा ग़ालिब ने एक मौलवी को चुनौती दी -- "गर है हिम्मत तो मस्जिद हिला के देख ...वरना आ मेरे पास ...थोड़ी पी और हिलती हुयी मस्जिद देख ." ...ईसा के अनुयाईयों ने भी खूब दारू पी और पिलाई और तमाम मोनालिसा की रोती सूरत उन्हें मुस्कुराती नज़र आयी ...वैसे ठेके पर ठर्रा जिसने चढ़ाई उसको नाली भी संगम या आब -ए -जमजम नज़र आयी ...इसीलिए कहता हूँ दारू एक कालजयी धर्म निरपेक्ष पतित पावन पेय है ." -----राजीव चतुर्वेदी


Sunday, March 17, 2013

तेरा यह क्रमशः टूटना मुझे यों तो कभी अच्छा नहीं लगा

"तेरा यह क्रमशः टूटना
मुझे यों तो कभी अच्छा नहीं लगा
पर एक वह दिन भी था जब मुझे अच्छा लगा था
तुम्हारी आशा टूटी
तुम्हारी भाषा टूटी
तुम्हारी हर परिभाषा टूटी
तुम्हारी भावना टूटी
तुम्हारा दिल टूटा
तुम्हारा सपना टूटा
और तुम किश्तों में टूट गए
अन्त में तुम्हारा मौन टूटा
और उस दिन तक स्थापित सच टूट गया
तुम्हारे शब्दों में नया सच उगा
तेरा यह क्रमशः टूटना
मुझे यों तो कभी अच्छा नहीं लगा
पर एक वह दिन भी था जब मुझे अच्छा लगा था
तब तक तो तू टूट चुका था किश्तों में
तब तक तो तू टूट चुका था रिश्तों में
टूट चुके आदमी का जब मौन टूटता है
तो टूटता है किसी अटूट समझे जाने वाले बाँध की तरह
और उस बाँध के किनारे की बस्तियां बह जाती है सच के सैलाब में
तेरा यह क्रमशः टूटना
मुझे यों तो कभी अच्छा नहीं लगा
पर एक वह दिन भी था जब मुझे अच्छा लगा था
." ----राजीव चतुर्वेदी

Friday, March 15, 2013

मुलजिमों के हाथ मुआवजा लेना तुम्हें कैसा लगा ?

"मुलजिमों के हाथ मुआवजा लेना तुम्हें कैसा लगा ?
सहमती सी शाम को अब सच बताओ
आंसुओं की यह इबारत बढ़ी कीमत पर कल अखबारों में छपेगी
वेदना, संवेदना, सतह पर तैरते साहित्य के जुमले सभी
निरर्थक मौत पर
सार्थक जिन्दगी का पैबंद सिलकर शामियाने सा सजाया जा रहा है
और उस शोकाकुल से सरकारी जलसे में
पाखंडी पराक्रम की पैमाइश करता वह शिखंडी सियासत का
वह पैसा फेंकता है जो उसके बाप का हरगिज नहीं था
लाश की कीमत लागात
े लोग
काश तुम जिन्दगी की कीमत जानते होते
कातिलों ने कफ़न की दूकान खोली है
और उस दूकान को दरकार ग्राहक की गुनाहगारों का ही गुणगान करती है
मुलजिमों के हाथ मुआवजा लेना तुम्हें कैसा लगा ?
सहमती सी शाम को अब सच बताओ
आंसुओं की यह इबारत बढ़ी कीमत पर कल अखबारों में छपेगी।"
----राजीव चतुर्वेदी

क्या तुम भी ज़िंदा हो ? ...तो बोलते क्यों नहीं ?

"किसी ने मुझे इत्तला दी है
कि मैं ज़िंदा हूँ अभी
क्या तुम भी ज़िंदा हो ?
तो बोलते क्यों नहीं ?
यही कि हमने धर्म बनाया है
धर्म ने हमको नहीं
यही कि जम्मू -कश्मीर में इस्लामिक आतंकवाद से
लाखों हिन्दू पलायन कर गए हैं और सैकड़ों मार दिए गए हैं
यही कि गोधरा काण्ड में 67 हिन्दुओं को ज़िंदा जलाने पर भड़के थे गुजरात के दंगे
यही कि अगर मूर्तिभंजन या बुतशिकनी जायज है
तो औरंगजेब से अब तक दस हजार से अधिक मंदिर तोड़ना जायज था
और यह भी कि बाबरी मस्जिद का तोड़ना भी जायज था
यही कि अगर मुहम्मद साहब का कार्टून बनाना नाजायज था
तो किसी हुसैन ने देवी देवताओं की तश्वीर से क्या किया ?
अगर उबेदुल्ला या वैसा ही कोई कठमुल्ला जायज है
तो तोगडिया क्यों नाजायज है ?
और यह भी कि अगर अमन की हिफाजत करते हमारे जवानो को कफ़न दोगे
तो हम हर दहशतगर्द और उसके हमदर्द को दफ़न कर देंगे ."
----राजीव चतुर्वेदी

Wednesday, March 6, 2013

मुझे चाहिए अपनी मौत ...उस पर हक़ है मेरा

"मेरी हथेली पर
पता नहीं किसने
कुछ रेखाएं खींच दी थीं
मेरे जन्म से शुरू हो कर मेरी उम्र बताती जीवन रेखा
जिन्दगी के तमाम पर्वतों को लांघ कर मृत्यु तक जाती जीवन रेखा
मैं एक यात्री हूँ
जीवन रेखा के आख़िरी छोर की ओर बढ़ता हुआ ...साल दर साल
मैं जिन्दगी को जी कर गुजर जाऊंगा परिदृश्य की तरह
मृत्यु के सफ़र पर निकला सैलानी
सफ़र पूरा होने से इतना डरता क्यों है ?
अपनी हथेली में बंद जीवन रेखा को आज़ाद कर दिया है मैंने
मुझे नहीं चाहिए तेरी जिन्दगी
मुझे चाहिए अपनी मौत
उस पर हक़ है मेरा
बटोर ले अपनी दुनियाँ निखरी है बहुत
बटोर ले अपनी दुनियाँ बिखरी है बहुत
बटोर ले अपनी दुनियाँ अखरी है बहुत .." ---- राजीव चतुर्वेदी

Monday, February 25, 2013

तुम उसे कविता क्यों समझ बैठे

"मेरे जज़बात मेरे जख्मों से वाबस्ता थे ,

मैं कराहा था तुम उसे कविता क्यों समझ बैठे ."
---राजीव चतुर्वेदी

वह तेरी आहट थी या मेरी बौखलाहट मौन टूट गया

"वह तेरी आहट थी
या मेरी बौखलाहट
मौन टूट गया
मौन ने तनहाई से तंग आकर तरन्नुम का तराना छेड़ा
मौन मुझको देखा तो कुछ लोगों ने फ़साना छेड़ा
मौन मेरे मन से टकराया तो आहट निकली
और उस आहट से जो अक्षर निकले
मौन से भयभीत से लोगों की वही भाषा थी
कहीं भड़का वह लावा बन कर
भूगोल में ज्वालामुखी की तरह फूट गया
कहीं अंगार ...कहीं श्रृगार ...कहीं संसार के सदमे
कहीं दहका ...कहीं महका ...
कहीं चहका वह चिड़ियों जैसा
ओस की बूँद में नहाया वो तितलियों जैसा
जमा तो दर्द हिमालय की वर्फ बन बैठा
उड़ा तो वह जलजले की गर्द बन बैठा
मेरे अन्दर के समंदर से वो उठता रहा भाप बन बन कर
गिरा तो बंजर भी बरसात में सरसब्ज हुए
मौन मेरा मेरे मन में पिघला
आँख से टपका था ...गाल से हो कर गुजरा
वह तेरी आहट थी
या मेरी बौखलाहट
मौन टूट गया ." 
   ----राजीव चतुर्वेदी

आज आतंकवाद का एक मजहब है या यों कहें पूरी दुनिया में एक ही मजहब का आतंकवाद है और वह है इस्लाम


"जबसे पाकिस्तान के एक लाख से अधिक अत्याधुनिक अमरीकन हथियारों से लैस सैनकों ने भारतीय सेना के आगे बिना एक भी गोली चलाये आत्म समर्पण किया (1971) तबसे पाकिस्तान भारत से प्रत्यक्ष युद्ध से कतराता है और परोक्ष युद्ध करता है ... इस परोक्ष युद्ध के लिए पाकिस्तान की ISI भारतीय मुसलमानों का मजहब के नाम पर इस्तेमाल करती है . जगह-जगह  हर संवेदनशील स्थान पर स्लीपिंग मोड्यूल देशद्रोह का काम कर रहे हैं ...जहां -जहां सैन्य छावनीयाँ हैं वहाँ के निकासी द्वार के मुहाने की सड़क पर एक मज़ार रातों रात उग आती है जहां से भारतीय सैन्य गतिविधियों की पाकिस्तान को मुखबिरी होती है ...हर सैन्य छावनी बाले  स्थान के रेलवे स्टेशन पर गौर करें उसके एक सिरे पर सरकारी जमीन में एक मज़ार बना दी गयी होगी .यहाँ से भारतीय सैन्य गतिविधियों  पर नज़र रखी जाती है और जरूरत पड़ने पर सूचना पाकिस्तान में बैठे अपने आकाओं को दी जाती है ...मस्जिदें  हमला करने के अड्डे बन चुकी हैं अलविदा की नवाज़ के बाद मुम्बई में शहीद स्मारक पर हमला ...लखनऊ में बुद्ध पार्क में बुद्ध प्रतिमा पर हमला ...वह भी क्यों ?--- केवल इस आक्रोश को व्यक्त करने के लिए कि पड़ोसी देश म्यांमार (वर्मा ) में बलात्कार करते पकडे जाने पर वहाँ की जनता ने दो मुसलमान युवकों को पीट -पीट कर मार डाला था लेकिन यह लोग किसी मस्जिद किसी मजलिस से भारतीय सैनिक हेमराज का सिर पाकिस्तान द्वारा काट लिए जाने पर कभी कोई बयान नहीं दिया . मुहर्रम पर पाकिस्तान के समर्थन के मस्जिदों मजलिसों से नारे सभी ने सुने हैं ...बस वोट बैंक की लालच में राजनीति ने नहीं सुने ...इसी स्लीपिंग मोड्यूल में एक वर्ग सक्रीय आतंकवाद में --तोड़फोड़ में भागीदारी करता है और दूसरा वर्ग उसे छिपाने का समाज और पुलिस को भ्रमित करने का और आतंक की परोक्ष हिमायत करने का काम करता है ...यह वह लोग हैं जो कथित तौर पर पढ़े लिखे हैं जो तमाम तरह के मीडिया पर जा कर यह कहते सुने जा सकते है कि --"आतंकवादीयों का कोई मजहब नहीं होता ." जबकि सभी जानते हैं कि भारत में आज आतंकवादीयों का एक ही मजहब है-- "इस्लाम" ...भारत ही नहीं पूरी दुनियाँ इस्लामिक आतंकवाद से  आक्रान्त है ...यह आतंकियों के स्लीपिंग मोड्यूल कभी अफज़ल गुरू को महिमा मंडित करते हैं क़ि मरते समय उसने कुरआन माँगी ,उसको मरने के पहले अपने पांच साल के बच्चे से भी मिलने नहीं दिया जबकि सभी जानते हैं कि जब वह गुजरे 11 साल से जेल में था तो उसका 5 साल का बेटा कैसे था आदि आदि ...जो लोग इस्लाम के प्रति वास्तव में सजग हैं और अपने आपको मुहम्मद का वंशज मानते हैं वह इस निर्णायक मोड़ पर अपना दीन और ईमान सम्हालें वरना यजीद और सूफियान के विचार वंशज तो दहशतगर्दी में लगे हैं और आज आतंकवाद का एक मजहब है या यों कहें पूरी दुनिया में एक ही मजहब का आतंकवाद है और वह है इस्लाम."--राजीव चतुर्वेदी                    


Thursday, February 14, 2013

उपासना प्रेम की आध्यात्मिक अनुभूति है और वासना देह की भौतिक अनुभूति


"कृष्ण उस प्यार की समग्र परिभाषा है जिसमें मोह भी शामिल है ...नेह भी शामिल है ,स्नेह भी शामिल है और देह भी शामिल है ...कृष्ण का अर्थ है कर्षण यानी खीचना यानी आकर्षण और मोह तथा सम्मोहन का मोहन भी तो कृष्ण है ...वह प्रवृति से प्यार करता है ...वह प्राकृत से प्यार करता है ...गाय से ..पहाड़ से ..मोर से ...नदियों के छोर से प्यार करता है ...वह भौतिक चीजो से प्यार नहीं करता ...वह जननी (देवकी ) को छोड़ता है ...जमीन छोड़ता है ...जरूरत छोड़ता है ...जागीर छोड़ता है ...जिन्दगी छोड़ता है ...पर भावना के पटल पर उसकी अटलता देखिये --- वह माँ यशोदा को नहीं छोड़ता ...देवकी को विपत्ति में नहीं छोड़ता ...सुदामा को गरीबी में नहीं छोड़ता ...युद्ध में अर्जुन को नहीं छोड़ता ...वह शर्तों के परे सत्य के साथ खडा हो जाता है टूटे रथ का पहिया उठाये आख़िरी और पहले हथियार की तरह ...उसके प्यार में मोह है ,स्नेह है,संकल्प है, साधना है, आराधना है, उपासना है पर वासना नहीं है . वह अपनी प्रेमिका को आराध्य मानता है और इसी लिए "राध्य" (अपभ्रंश में हम राधा कहते हैं ) कह कर पुकारता है ...उसके प्यार में सत्य है सत्यभामा का ...उसके प्यार में संगीत है ...उसके प्यार में प्रीति है ...उसके प्यार में देह दहलीज पर टिकी हुई वासना नहीं है ...प्यार उपासना है वासना नहीं ...उपासना प्रेम की आध्यात्मिक अनुभूति है और वासना देह की भौतिक अनुभूति इसी लिए वासना वैश्यावृत्ति है . जो इस बात को समझते हैं उनके लिए वेलेंटाइन डे के क्या माने ? अपनी माँ से प्यार करो कृष्ण की तरह ...अपने मित्र से प्यार करो कृष्ण की तरह ...अपनी बहन से प्यार करो कृष्ण की तरह ...अपनी प्रेमिका से प्यार करो कृष्ण की तरह ... .प्यार उपासना है वासना नहीं ...उपासना प्रेम की आध्यात्मिक अनुभूति है और वासना देह की भौतिक अनुभूति ." ----राजीव चतुर्वेदी

Thursday, February 7, 2013

फ़तवा क्या है ?


"फ़तवा क्या है ? ज़रा इसके क्रमबद्ध विकास की कहानी और क्रम पर तो गौर करें . फतह (जीत), फर्ज (दायित्व ), फरमान (शासनादेश ), फतवा (निर्देश ), फौत (मृत्यु ) और फातिहा (शोक /श्रद्धांजलि गीत या वाक्य ) ... जी हाँ जनाब अब समझ चले होंगे फतह,फर्ज,फरमान,फ़तवा,फौत और फातिहा जैसे शब्द संबोधनों के विकास की क्रमबद्ध कहानी ...यह राज्य करने की आकांक्षा को अपने गर्भ में छिपाए मजहब की भाषा है . फ़तवा, जेहाद और खिलाफत शब्द हर मुसलमान के जेहन में हैं पर उनमें से शायद ही कोई उसका सही प्रयोग करता हो ...सही प्रयोग तो तब करेगा जब उसे सही अर्थ पता हो ...खिलाफत का सही अर्थ है "समर्थन" किन्तु लोग इसे "विरोध" की जगह इस्तेमाल करते हैं जबकि उनको "मुखालफत" कहना चाहिए ...खिलाफत तो हुयी खलीफा की हाँ में हाँ मिलाना या समर्थन . खैर बात एक बार फिर फतवे पर है ...कश्मीर की चार बेटियों ने एक बैण्ड बनाया किन्तु मुल्लाओं को लगा उनका बैण्ड बज गया ...बैण्ड का नाम है परगास (प्रभात किरण ) .फतवा आया कि बैण्ड पर प्रतिबन्ध है क्योंकि वह इस्लाम के विरुद्ध है ...संगीत से इस्लाम को ख़तरा है ...एक हिंसक मजहब संगीत से खौफजदा है इस लिए खामोश हो जाओ ...बेचारी बेटियाँ खामोश हो गयीं ...अजीब लोग हैं यहाँ जहां खवातीन (महिलायें ) खामोश रहती हैं ...आयशा के आंसू कोई नहीं पोंछता पर फाहिशा का मुजरा हर कोई सुनता है ...शमशाद बेगम , नूरजहाँ , बेगम अख्तर ,सुरैया ,आबिदा परवीन , रूना लैला, नादिया हसन जाने कितने ही नाम हैं जिन पर कभी कोई फतवा नहीं आया ...नकाब और हिजाब की बात करते मौलवियों को फिल्म में काम करती किस्म -किस्म से जिस्म दिखाती फाहिशा नहीं दिखीं ...अभी हाल की बीना मालिक नहीं दिखी ...जीनत अमान की दुकान नहीं दिखी ...भारत -पाकिस्तान -बँगला देश से निकाह के नाम पर अरब देशों के शेखों द्वारा खरीद कर ले जाई जाती हुयी अपनी बेटियाँ नहीं दिखीं ...क्या उनको यह भी नहीं पता कि विश्व की हर चौथी बाल वैश्या भारत -पाकिस्तान -बँगला देश की बेटी है और मजहबी आधार पर यदि देखा जाए तो बाल वेश्याओं के मामले में मुसलमान विश्व के बहुसंख्यक हैं ...इस पर तो कभी फतवा नहीं आया ....जुआ/सट्टा हराम है पर दाउद इब्राहम का काम है ,फिक्सिंग के लिए क्रिकेट बदनाम है पर एक बड़ी तादाद इसमें लगी है सो इस पर भी फतवा नहीं आया ...कल एक मौलवी TV में ही बता रहे थे कि TV देखना हराम है उस पर भी फतवा पर देशद्रोह हराम नहीं है इस लिए उस पर कोई फतवा नहीं ...बेगुनाहों का क़त्ल हराम नहीं है इस लिए उस पर भी कोई फतवा नहीं ...हमारी बेटियों को खरीद कर कोइ शेख /समृद्ध ले जाए उस पर भी कोई फतवा नहीं ...मुजरा सुनने वालों पर भी कोई फतवा नहीं ...बलात्कार करने वालों पर भी कोई फतवा नहीं ....वाह रे मौलवी तेरी फतह की इक्षा और फतवे की समीक्षा ...नीरज ने लिखा था --"अब तो एक ऐसा मजहब भी चलाया जाए जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए ." -----राजीव चतुर्वेदी



Saturday, February 2, 2013

मैं मरने के पहले एक बार चीखूंगा जरूर

"मैं मरने के पहले एक बार चीखूंगा जरूर ,
तुम मरने के बहुत पहले ही चीखो
क्योंकि मरने के बाद आदमी नहीं चीखता
और अगर चीखा होता
तो शायद
इतनी जल्दी मरता भी नहीं
तमाम लोग जो ज़िंदा दिखते हैं, मर चुके हैं
इसी लिए चीखते ही नहीं
मैं चीखना चाहता हूँ
क्योंकि अब मैं मरना चाहता हूँ
और बता देना चाहता हूँ
मरना मेरी व्यक्तिगत जिम्मेदारी है
और मरने से पहले चीखना सामाजिक जिम्मेदारी है
मेरा जन्म हुआ था तो तय था अब मुझे एक दिन मरना ही होगा
मेरी चीख में लिपटी है मेरी शेष बची जिन्दगी
जिसे मैं जीना चाहता था
तुम्हारी तरह
मैं अब तुम्हारी तरह जीना नहीं चाहता
मैं अब अपनी तरह मरना चाहता हूँ
आखिर क़त्ल होने के पहले चीखने का हक़ तो है मुझे
मेरी चीख वह अंतिम आवाज़ है जिससे शुरू होती है कातिल की पहचान
तमाम लोग जो ज़िंदा दिखते हैं, मर चुके हैं
इसी लिए चीखते ही नहीं
मैं चीखना चाहता हूँ
मेरे मरने के बाद मेरी शवयात्रा में शामिल लोग कहेंगे
यह शक्स मरने के पहले बेहद ज़िंदा था
और इसका आशय यह भी होगा कि
ज़िंदा लोग मरने के पहले ही बेहद मुर्दा हैं
इसी लिए चीखते ही नहीं ." ----राजीव चतुर्वेदी

Friday, February 1, 2013

राष्ट्र के प्रतीकों को तोड़ कर आसान किश्तों में हमने राष्ट्र को तोड़ा है

"पुराने नायकों की प्रतीक प्रतिमा हमने तोड़ दी और नए नायक हम पर हैं नहीं अब युवा प्रेरणा किससे ले ? ...शाहरुख खान या सचिन से ? ...नायक समाज का कुतुबनुमा होता है ...नायकों की प्रतिमा /छवि टूटने के साथ ही हमारा कुतुबनुमा भी टूट गया ...आज हम दिशाहीन से खड़े हैं ...वास्तविक नायक सदैव राजनीति से आते हैं ...शंकर, राम, कृष्ण, मुहम्मद , ईसा ...भारत गुलाम था संघर्ष की राजनीतिक प्रक्रिया में नायकों का उदय हुआ लक्ष्मी बाई ,तात्याँ टोपे, नाना फडनवीस, मंगल पाण्डेय, ऊधम सिंह, भगत सिंह ,सुभाष, चन्द्र शेखर आज़ाद, दादा भाई नौरोजी, वर्दोलाई जैसे नायकों का उदय हुआ ...इनमें एक महानायक उदित हुआ महात्मा गांधी तो हम ने ही उसकी ह्त्या कर दी ...गांधी की ह्त्या आज़ाद भारत की पहली आतंकवादी घटना थी और जो तर्क गणाधी जी की ह्त्या के दिए गए उनके अनुसार अगर मारना था तो मारते जिन्ना को ...पर जिन्ना नहीं गाँधी को को पार कर देश का उस समय का सबसे बड़ा प्रतीक तोड़ दिया वह भी स्वदेशी का नारा देने वाले को विदेशी पिस्तौल से मार कर ...अहिंसा के नारे को हिंसा से बुझा कर ...गाँधी मरने के बाद भी प्रतीक प्रतिमा के रूप में समाज और राजनीति को दिशा देता रहा तो वामपंथियों ने उसकी तश्वीर पर भगत सिंह की तश्वीर दे मारी ...अभी भी गाँधी की तश्वीर पूरी तरह हमारे जहन में टूटी नहीं थी तो आंबेडकर की तश्वीर दे मारी ...शेष बची तश्वीर की किरचों पर सुभाष की तश्वीर दे मारी ...हमने सभी की प्रतिमाएं तोड़ डालीं ...सारे कुतुबनुमा तोड़ दिए ...इस्लाम मूर्तियाँ तोड़ कर संस्कृति तोड़ता है इसी लिए मूर्ती भंजक है ...भारत को पहले मुगलों ने गुलाम बनाया ...मुगलों को अंग्रेजों ने गुलाम बनाया ...जब आज़ाद हुए तो हमको फिर से गुलाम बनाने की चुनौती मुगलों और अंग्रेजों के सामने थी और हम उनके इस षड्यंत्र में जाने अनजाने शामिल हो गए ...आज हमारे पास कोई राष्ट्र नायक प्रतीक प्रतिमा (व्यक्तित्व ) नहीं है ....राष्ट्रवादी व्यक्तित्व का ध्रुवीकरण होना बहुत जरूरी है ...प्रतीक प्रतिमा के अभाव में देश का युवा टूटा कुतुबनुमा लिए दिशाहीन सा भटक रहा है ...उसे कभी अन्ना ,कभी केजरीवाल ,कभी राम देव के हाथों गांधी की टिमटिमाती लौ जल कर फिर मसाल बनती दिखती है पर बनती नहीं है ....असली प्रतीकों के अभाव में फर्जी प्रतीक गढ़े और मढ़े जा रहे हैं ...किसी भी राष्ट्र को तोड़ने के लिए आवश्यक है उसके प्रतीकों को तोड़ना ...भारत में मूर्ति भंजक मुसलमानों ने यह किया तो गांधी की ह्त्या कर अति हिंदूवादी संगठनों ने भी वही किया .....आज इस राष्ट्र पर कोई प्रतीक प्रतिमा नहीं है ...राष्ट्र के प्रतीकों को तोड़ कर आसान किश्तों में हमने राष्ट्र को तोड़ा है ....इसके पहले हम फिर से गुलाम बने हमको अपने प्रतीकों पर ध्रुवीकरण करना होगा ." -----राजीव चतुर्वेदी